– विरोधी दल में बड़े बड़े नेताओं ने शुरू किया है विरोध मोर्चा
अशोक झा/ कोलकाता: चिकन नेक बंगाल बिहार में सियासत का पारा इन दिनों सातवें आसमान पर है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भारतीय सेना के बीच पैदा हुए एक विवाद ने राज्य से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक चर्चा को जन्म दे दिया है। किशनगंज में जहां एक ओर सेना के नये कैम्प को लेकर जिस तरह से असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM उतर आई है और इसे अपनी राजनीति में घसीट रही है, वह काफी चिंता पैदा करने वाला है. सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि यहां सेना की मजबूत मौजूदगी घुसपैठ, तस्करी और सीमा पार गतिविधियों पर लगाम के लिए जरूरी है। लेकिन एनएच-27 के पास प्रस्तावित आर्मी कैम्प के खिलाफ AIMIM के धरने ने इस संवेदनशील इलाके में राजनीति बनाम राष्ट्रहित की नई बहस छेड़ दी है।
बांग्लादेश बॉर्डर से सटा संवेदनशील जिला: किशनगंज जिले के एन एच-27 स्थित टाउन हॉल के सामने कोचाधामन के सकोर में प्रस्तावित आर्मी कैम्प के विरोध में एक दिवसीय धरना दिया। इस धरने में एआईएमआईएम विधायक सरवर आलम सहित बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। धरना स्थल पर भारी पुलिस बल की तैनाती रही। विरोध का कारण जमीन को उपजाऊ बताते हुए सेना कैम्प के निर्माण को रोकने की मांग की गई। लेकिन बांग्लादेश की नापाक हरकतों के बीच यह पूरा इलाका बेहद संवेदनशील है, लेकिन सेना कैम्प के विरोध ने अब राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम राजनीतिक एजेंडा की बहस को जन्म दे दिया है।
सेना कैम्प पर सियासत का आरोप :एआईएमआईएम के धरने को लेकर सवाल यह उठ रहा है कि क्या असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी सेना जैसे संस्थान को भी अपनी राजनीति में घसीट रही है। विपक्षी दलों और स्थानीय लोगों का एक वर्ग मानता है कि यह विरोध सुरक्षा हितों को नजरअंदाज कर किया जा रहा है। उनका कहना है कि सेना कैम्प का उद्देश्य किसी की जमीन छीनना नहीं, बल्कि सीमा क्षेत्र को सुरक्षित करना है। वही बंगाल में यह मामला सेना पर लगाए गए उन आरोपों से जुड़ा है, जिनमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया कि फोर्ट विलियम में तैनात एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के अंतर्गत भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में काम कर रहा है। इन आरोपों को भारतीय सेना ने सिरे से खारिज करते हुए राज्यपाल सी. वी. आनंद बोस से औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है।
SIR को लेकर ये है विवाद?
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में एक प्रेस वार्ता में कहा था कि उन्हें जानकारी मिली है कि फोर्ट विलियम में तैनात एक कमांडेंट SIR प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रहा है और वह भाजपा को लाभ पहुँचाने का प्रयास कर रहा है। SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन, चुनाव आयोग से जुड़ी एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसमें वोटर लिस्ट के सत्यापन और अद्यतन का काम किया जाता है। साधारण तौर पर यह प्रक्रिया राज्य सरकार के कर्मचारियों और चुनाव आयोग के अधिकारियों के माध्यम से पूर्ण की जाती है।
सेना का कहना है कि उसका SIR जैसी किसी चुनावी प्रक्रिया से कोई लेना-देना नहीं है और किसी भी सैन्य अधिकारी का राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होना नियमों के खिलाफ है। इसी वजह से पूर्वी कमान के वरिष्ठ अधिकारियों ने राज्यपाल से मुलाकात कर मुख्यमंत्री के आरोपों पर आपत्ति जताई और हस्तक्षेप की मांग की।
राज्यपाल से मुलाकात और सेना की प्रतिक्रिया
जानकारी के अनुसार, फोर्ट विलियम स्थित पूर्वी कमान के दो वरिष्ठ जनरलों ने पिछले हफ्ते राज्यपाल सी. वी. आनंद बोस से मुलाकात कर एक पत्र सौंपा। इस पत्र में मुख्यमंत्री द्वारा लगाए गए आरोपों को ‘निराधार और सेना की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने वाला’ बताया गया है। सेना ने साफ़ किया कि वह संविधान के अंतर्गत सिर्फ केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय के आदेशों का पालन करती है, न कि किसी राजनीतिक दल के।
सेना का यह भी कहना है कि इस तरह के सार्वजनिक आरोपों से न सिर्फ सैन्य बलों की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं, बल्कि संस्थागत गरिमा भी प्रभावित होती है।
फोर्ट विलियम में मंच हटाने का पुराना मामला
इस पूरे विवाद की जड़ अगस्त महीने में फोर्ट विलियम परिसर से जुड़ा एक पुराना मामला भी माना जा रहा है। जानकारी के मुताबिक, सेना के एक मैदान में दो दिनों के कार्यक्रम के लिए अस्थायी मंच लगाने की अनुमति दी गई थी। सेना के नियमों के मुताबिक, स्थानीय सैन्य प्राधिकरण सिर्फ दो दिन तक के आयोजन की अनुमति दे सकता है। इससे ज्यादा अवधि के लिए रक्षा मंत्रालय से अनुमति ज़रूरत होती है।
आरोप है कि कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी मंच को करीब एक महीने तक नहीं हटाया गया। सेना ने पहले कोलकाता पुलिस और संबंधित प्रशासन को जानकारी दी, लेकिन जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो सेना ने खुद मंच को हटाने का फैसला किया। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने आरोप लगाया कि सेना ने यह कदम राजनीतिक दबाव में उठाया है।
राजनीति और संस्थाओं के बीच टकराव
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर राजनीति और संवैधानिक संस्थाओं के संबंधों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां TMC का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों और अब सेना का प्रयोग राज्य सरकार को घेरने के लिए किया जा रहा है, वहीं सेना और विपक्षी दल इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सेना जैसी संवेदनशील और गैर-राजनीतिक संस्था को राजनीतिक बहस से दूर रखना लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। किसी भी पक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों की पुष्टि तथ्यों और संवैधानिक प्रक्रियाओं के आधार पर ही होनी चाहिए। अब, आगे क्या? फिलहाल, राज्यपाल की भूमिका इस मामले में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्यपाल इस शिकायत पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या केंद्र या चुनाव आयोग की तरफ से कोई स्पष्टीकरण सामने आता है। वहीं, पश्चिम बंगाल में आगामी राजनीतिक घटनाक्रमों को ध्यान देते हुए यह विवाद और भी तूल पकड़ सकता है।कुल मिलाकर, ममता बनर्जी और भारतीय सेना के बीच यह विवाद न सिर्फ राज्य की राजनीति बल्कि राष्ट्रीय विमर्श में भी एक बड़ा मुद्दा बन गया है, जहां निष्पक्षता, संस्थागत सम्मान और लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर बहस तेज हो गई है।








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