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    Home » आज से लग गया होलाष्टक: इस दौरान नहीं होगा कोई शुभ कार्य

    आज से लग गया होलाष्टक: इस दौरान नहीं होगा कोई शुभ कार्य

    Roaming ExpressBy Roaming ExpressFebruary 23, 2026 धर्म एवं आस्था

     

    – 3 मार्च को होलिका दहन और 4 मार्च को होगा रंगों का त्यौहार होली

    अशोक झा/ सिलीगुड़ी: फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी यानि मंगलवार से आठ दिनी होलाष्टक 2026 लगेगा जो 3 मार्च तक रहेगा। इस दौरान शुभ कार्य जैसे नामकरण संस्कार, विवाह, सगाई सहित सोलह संस्कारों पर विराम लगेगा। होलाष्टक आज 24 फरवरी से प्रारंभ हो रहा है।होलिका दहन और होली की तिथि : हृषिकेश पंचांग के अनुसार होलिका दहन सोमवार, 3 मार्च को किया जाएगा। उसी दिन रात्रि 12:50 बजे से 2:02 बजे तक होलिका दहन का शुभ मुहूर्त निर्धारित है. रंगों की होली बुधवार, 4 मार्च को खेली जाएगी.
    चंद्र ग्रहण की विशेष जानकारी:3 मार्च को सायं 6:00 बजे से 6:48 बजे तक खंडग्रास चंद्रग्रहण रहेगा। ऐसे में धार्मिक कार्य करते समय सावधानी रखने और ग्रहण काल के नियमों का पालन करने की सलाह दी जाती है।
    होलाष्टक में मांगलिक कार्य वर्जित:जैसे ही होलाष्टक आरंभ होता है, विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे शुभ एवं मांगलिक कार्यों को रोक दिया जाता है. मान्यता है कि यह समय साधना और संयम का होता है, न कि उत्सव या नए शुभ कार्यों का.
    भक्ति और साधना का महत्व:
    होलाष्टक के दौरान भगवान श्रीहरि का जप और भजन करना विशेष फलदायी माना गया है. पौराणिक कथा के अनुसार इसी अवधि में प्रह्लाद ने पिता के विरोध के बावजूद अपनी भक्ति को और अधिक दृढ़ किया था. इसलिए यह समय आस्था और आध्यात्मिक साधना के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।
    होलिका दहन से जुड़ी पारंपरिक मान्यताएं: होलिका दहन से पहले शरीर पर सरसों या उबटन लगाने की परंपरा है. मान्यता है कि उबटन से निकला मैल होलिका में अर्पित करने से रोग-निवारण और उत्तम स्वास्थ्य की कामना पूर्ण होती है.
    उपली अर्पित करने की परंपरा
    ग्रामीण परंपरा के अनुसार हर घर से एक उपली (गोबर के कंडे) होलिका में डाली जाती है. इसे परिवार की भागीदारी और सामूहिक शुभकामना का प्रतीक माना जाता है.
    होलिका में क्या न डालें
    होलिका दहन में कूड़ा-करकट या गंदगी डालना उचित नहीं माना जाता। यह पवित्र अग्नि बुराइयों और नकारात्मकता को जलाने का प्रतीक है, इसलिए इसमें केवल शुद्ध और पारंपरिक सामग्री ही अर्पित करनी चाहिए।
    इस प्रकार, इस वर्ष होलिका दहन 3 मार्च को और रंगों की होली 4 मार्च को मनाई जाएगी. होलाष्टक के दौरान संयम, भक्ति और सकारात्मक सोच अपनाना ही इस पर्व का वास्तविक संदेश है।
    होलिका दहन पर्व के बारे में माना जाता है कि कश्यप ऋषि की पत्नी दिति से हिरण्यकश्यप, हिरण्याक्ष और होलिका का जन्म हुआ. प्रारंभ में हिरण्यकश्यप भगवान का उपासक था. भगवद्भक्ति से प्रेरित होकर उसने अपने पुत्र का नाम प्रह्लाद रखा. लेकिन जब भगवान विष्णु ने हिरण्याक्ष का वध किया, तब माता दिति शोक में डूब गईं और हिरण्यकश्यप भी विष्णु का विरोधी बन गया. उसने बदला लेने का संकल्प किया.
    प्रह्लाद की अटूट भक्ति
    हिरण्यकश्यप के विरोध के बावजूद प्रह्लाद पर प्रारंभिक संस्कारों का प्रभाव रहा और वह हर समय “नारायण” का नाम जपता रहा. हिरण्यकश्यप ने दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य के पुत्र शंड और अमर्क को प्रह्लाद को समझाने के लिए लगाया, लेकिन वे उसे भगवान से विमुख नहीं कर सके. प्रह्लाद की आस्था अडिग रही.
    श्रीमद्भागवत की शिक्षा
    श्रीमद्भागवत कथा के अनुसार, प्रह्लाद ने अपने पिता से कहा कि संसार के लोग ‘मैं’ और ‘मेरे’ के मोह में उलझे रहते हैं. उन्होंने सलाह दी कि मनुष्य को मोह छोड़कर भगवान श्रीहरि की शरण लेनी चाहिए. यह सुनकर हिरण्यकश्यप क्रोधित हो गया और उसने प्रह्लाद को मारने की योजना बनाई।
    होलिका की दुविधा और त्याग
    हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठे. कथा के अनुसार, होलिका को वरदान था कि वह अग्नि से नहीं जलेगी. लेकिन एक नारी का हृदय कोमल होता है. प्रह्लाद उसकी भतीजा था, इसलिए उसके मन में ममता जाग उठी. कहा जाता है कि अंततः उसने प्रह्लाद को बचाने का निर्णय लिया.
    होलाष्टक के आठ दिन
    होलिका दहन से पहले आने वाले आठ दिन होलाष्टक कहलाते हैं. माना जाता है कि इन आठ दिनों में होलिका मानसिक रूप से स्वयं को तैयार करती रही. अंत में वह प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठी, लेकिन प्रह्लाद को बचा लिया और स्वयं जल गई. तभी से होलिका दहन की परंपरा शुरू हुई.
    होलिका दहन का सामाजिक संदेश
    होलिका दहन केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. इस पर्व के समय लोग होलिका को जलाकर अपने भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों को समाप्त करने का संकल्प लेते हैं. तभी होली का उल्लास पूर्ण रूप से सार्थक होता है.
    होलाष्टक का आध्यात्मिक अर्थ
    ‘होलाष्टक’ शब्द ‘होला’ और ‘अष्टक’ से बना है. आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, होलिका का अर्थ लकड़ी, घास-फूस है और अष्टक का अर्थ आठ अवगुणों से है. इन अवगुणों में चुगलखोरी, दुस्साहस, द्रोह, ईर्ष्या, असूया, अर्थदूषण, वाणी की कठोरता और पारुष्य शामिल हैं. इन बुराइयों को जलाना ही होलिका दहन का असली उद्देश्य है.
    हिरण्यकश्यप का प्रतीकात्मक अर्थ
    हिरण्यकश्यप शब्द का अर्थ भी प्रतीकात्मक है. ‘हिरण्य’ का अर्थ स्वर्ण, ज्ञान और प्रकाश है, जबकि ‘कश्यप’ का अर्थ मृग यानी पशु प्रवृत्ति से है. जब ज्ञान और शक्ति का उपयोग अहंकार और अत्याचार के लिए होने लगे, तो उसका विनाश आवश्यक हो जाता है.
    होलिका दहन की कथा हमें सिखाती है कि मन के भीतर छिपे विकारों को जलाकर विवेक और भक्ति को बचाना चाहिए. प्रह्लाद आस्था और सत्य का प्रतीक हैं. जब हम अपने भीतर की बुराइयों को समाप्त करते हैं, तभी जीवन में सच्चा आनंद और उत्सव संभव होता है।

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