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    Home » बैद्यनाथ मंदिर के निर्माण में देवशिल्पी का योगदान, जानें क्या है मान्यता

    बैद्यनाथ मंदिर के निर्माण में देवशिल्पी का योगदान, जानें क्या है मान्यता

    बंगाल और देवघर में विश्वकर्मा पूजा का विशेष महत्व
    Roaming ExpressBy Roaming ExpressSeptember 17, 2025 धर्म एवं आस्था

    अशोक झा/ सिलीगुड़ी: बंगाल ओर झारखंड में बाबा बैद्यनाथ मंदिर में विश्वकर्मा पूजा का विशेष महत्व है। क्योंकि कहते है कि झारखंड अगर बाबा की नगरी है तो बंगाल आदि शक्ति का क्षेत्र है। इन दोनों क्षेत्र में ज्यादातर मंदिर का निर्माण बाबा विश्वकर्मा की ओर से किया गया है। इसलिए आज के दिन इनका विशेष महत्व है। भगवान विश्वकर्मा को इंजीनियरों, कारीगरों और मशीनों का रक्षक माना जाता है। विश्वकर्मा उत्सव बंगाली माह भाद्र के अंतिम दिन मनाया जाता है, जिसे भाद्र संक्रांति या कन्या संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व आमतौर पर सितंबर के मध्य में पड़ता है। विश्वकर्मा पूजा खासतौर पर उन राज्यों में धूमधाम से मनाई जाती है जहां औद्योगिक और शिल्पकलाओं का महत्व है, जैसे असम, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा और त्रिपुरा। इस दिन लोग भगवान विश्वकर्मा की पूजा-अर्चना करते हैं, जिन्हें निर्माण और शिल्प कौशल का देवता माना जाता है। विश्वकर्मा पूजा का यह पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि कामगारों और शिल्पकारों के लिए भी गर्व का अवसर होता है। इस दिन अनेक कार्यशालाओं और फैक्ट्रियों में बंद रहता है ताकि सभी लोग श्रद्धा से भगवान विश्वकर्मा की पूजा कर सकें।बंगाल में विश्वकर्मा पूजा का महत्व, इतिहास एवं विशेषताएं
    विश्वकर्मा पूजा का उद्देश्य कार्यस्थलों में समृद्धि, सुरक्षा और सफलता की कामना करना है। इस दिन औजारों, मशीनों और कार्यस्थलों की पूजा से कार्य में बाधाएं कम होती हैं और व्यवसाय में वृद्धि होती है। इसके अलावा इतिहास की बात करें तो भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि के पहले शिल्पकार और वास्तुकार माना जाता है। मान्यता है कि ब्रह्माजी के कहने पर उन्होंने सृष्टि का निर्माण किया और देवताओं के लिए विभिन्न महलों और यंत्रों की रचना की। यह पूजा विशेष रूप से श्रमिकों, कारीगरों, इंजीनियरों और उद्योगपतियों के लिए महत्वपूर्ण है। पूजा से मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति और कार्यों में सफलता मिलती है।विश्वकर्मा पूजा के लाभ : विश्वकर्मा पूजा से न केवल व्यवसाय में वृद्धि होती है, बल्कि यह कार्यस्थल पर सकारात्मक ऊर्जा और सुरक्षा भी प्रदान करती है। इस दिन की पूजा से कई तरह के लाभ प्राप्त होते हैं जो व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
    व्यावसायिक सफलता: कार्यस्थल और उपकरणों की पूजा से मशीनों की देखभाल होती है, जिससे काम में बाधाएं कम होती हैं और व्यवसाय तेजी से बढ़ता है। सकारात्मक ऊर्जा: पूजा स्थल और कार्यस्थल को सजाने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे परिवार और कर्मचारियों का मन शांत और उत्साहित रहता है। सुरक्षा और दीर्घायु: औजारों और मशीनों की पूजा उनके सुरक्षित संचालन और दीर्घायु को सुनिश्चित करती है, जिससे कार्यस्थल पर दुर्घटनाओं की संभावना कम हो जाती है। आध्यात्मिक विकास: भगवान विश्वकर्मा की आराधना से भक्ति भाव बढ़ता है और व्यक्ति अपने कार्यों में अनुशासन और निष्ठा के साथ जुड़ता है। इसके अलावा पूजा से परिवार और समाज में मान-सम्मान बढ़ता है और सामूहिक सहयोग व सौहार्द्र की भावना मजबूत होती है।

    देवघर के बैद्यनाथ मंदिर निर्माण से जुड़ी कहानी में भगवान विश्वकर्मा का अहम योगदान बताया गया है. खबर में जानें पूरी कहानी देवघर: बाबा नगरी देवघर में विश्वकर्मा पूजा का विशेष महत्व है। इसकी पीछे धार्मिक मान्यताएं और पौराणिक कहानी है। इसलिए देवघर में धूमधाम के साथ भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है। इस संबंध में बैद्यनाथ मंदिर के तीर्थ पुरोहित संजीव ने बताया कि इस बार का विश्वकर्मा पूजा बेहद खास है, क्योंकि आज एकादशी तिथि है और साथ ही बुधवार को भगवान गणेश का दिन भी है. एक साथ ये सारे संयोग पड़ने से पूजा का मुहूर्त और भी शुभ हो गया है।बैद्यनाथ मंदिर के निर्माण से जुड़ी मान्यता
    वहीं बाबा मंदिर के वरिष्ठ पुजारी बबलू सिंगारी ने बताया कि बैद्यनाथ मंदिर के निर्माण में भगवान विश्वकर्मा का सबसे अहम योगदान माना जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शिवलिंग की स्थापना के समय मंदिर परिसर में पांच मंदिरों का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने किया था.
    परिसर में हैं कुल 21 मंदिर: बताते चलें कि बाबा बैद्यनाथ मंदिर परिसर में 21 मंदिर हैं, जिसमें पंच मंदिर का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने खुद अपने हाथों से किया था. उसके बाद अन्य मंदिरों का निर्माण समय-समय पर तत्कालीन राजाओं द्वारा कराया गया. उन्होंने कहा कि विश्वकर्मा को भगवान विष्णु का रूप माना जाता है. पहले बैद्यनाथ धाम में भगवान विष्णु के मंदिर का गुंबद सबसे ऊंचा हुआ करता था, लेकिन हिंदू धर्मग्रंथों में स्पष्ट लिखा है कि बाबा बैद्यनाथ मंदिर से ऊंचा कोई मंदिर नहीं हो सकता. इसलिए भगवान विश्वकर्मा ने ही उस गुंबद को छोटा करवा दिया था. पुजारियों के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा की पूजा आदिकाल से होती आ रही है. बैद्यनाथ धाम में उन्हें शिल्पकार और सृष्टि के कारीगर के रूप में पूजा जाता है।
    बंगाल और देवघर में श्रद्धा से मनाई गई विश्वकर्मा पूजा
    आपको बता दें कि देवघर में विश्वकर्मा पूजा श्रद्धा के साथ मनाई जा रही है. घर-घर में लोग अपने वाहनों और मशीनों की पूजा करते नजर आए. साथ ही कई जगहों पर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा भी स्थापित की गई है. विश्वकर्मा पूजा को लेकर जिले का माहौल भक्तिमय हो गया है।

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