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    Home » बंगाल में दुर्गापूजा बना सियासी पर्व, भाजपा टीएमसी में श्रद्धालुओं को मनाने की होड़ 

    बंगाल में दुर्गापूजा बना सियासी पर्व, भाजपा टीएमसी में श्रद्धालुओं को मनाने की होड़ 

    राजनीति में लगातार आ रही गिरावट, लोकतंत्र के लिए खतरे का संकेत
    Roaming ExpressBy Roaming ExpressSeptember 27, 2025 धर्म एवं आस्था

    अशोक झा/ कोलकाता: पश्चिम बंगाल का मुख्य त्योहार दुर्गा पूजा राजनीतिक रंग में रंग गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और उनकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी भाजपा अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए अपने प्रचार अभियान के विषयों को प्रदर्शित करने के लिए पूजा पंडालों का इस्तेमाल कर रही हैं। भाजपा अपने राष्ट्रवाद के मुद्दे को आगे बढ़ाने के लिए अपने समर्थकों द्वारा स्थापित पूजा पंडालों में ऑपरेशन सिंदूर की थीम का इस्तेमाल कर रही है। तृणमूल प्रायोजित पंडाल बंगाली अस्मिता या बंगाली गौरव के बारे में हैं, जो भाजपा को एक “बाहरी” पार्टी के रूप में चित्रित करने के प्रयास में बनर्जी का मुख्य आख्यान होगा। भाजपा के पंडाल उन हथियार प्रणालियों के प्रदर्शन से भरे हुए हैं जिन्होंने पाकिस्तान के साथ संक्षिप्त युद्ध के दौरान भारत को बढ़त दिलाई थी। इनमें एस-400 मिसाइल प्रणाली और ब्रह्मोस शामिल हैं, जो पाकिस्तानी मिसाइलों को मार गिराने में बेहद कारगर साबित हुईं, जिनमें से एक का निशाना दिल्ली था। तृणमूल कांग्रेस के पंडाल बंगाली संस्कृति पर आधारित हैं, जिनमें कला और शिल्प के प्रदर्शन और रवींद्र संगीत और लोक नृत्यों की सांस्कृतिक संध्याएँ शामिल हैं।
    शायद यह पहली बार है जब दुर्गा पूजा ने राजनीतिक रंग ले लिया है। यह इस बात का संकेत है कि इस बार मुकाबला कितना कड़ा है, जहाँ भाजपा टीएमसी को सत्ता से बेदखल करने के लिए दृढ़ है और बनर्जी अगले साल भाजपा को करारी शिकस्त देकर अपना दबदबा साबित करने की कोशिश में हैं।पहली नजर में ऐसा लगता है कि अब सभ्य राजनेता बहुत कम रह गए हैं। जिस तरह से राजनेताओं के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल आम होता जा रहा है उससे साफ है कि सियासत का स्तर निम्न स्तर को छू रहा है। शब्द अपनी मर्यादाएं तोड़ते नजर आ रहे हैं। विचारों की अभिव्यक्ति का अधिकार सबको है लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि प्रधानमंत्री या किसी अन्य नेता की मां को गाली दी जाए। शिष्टता राजनीति से गहराई से जुड़ी है। यह एक राजनीतिक गुण है जो इस राजनीतिक आदर्श को कायम रखता है कि हमारे मतभेदों और बहुलता के बावजूद हम नागरिकों के रूप में एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। राजनीति का असभ्य होना इस बात का प्रमाण है कि हमारे राजनेता भी एक-दूसरे से जुड़ नहीं पाते। सिर्फ इसलिए कि हम महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमत नहीं हो पाते। राजनीति का वह दौर भी लोगों ने देखा है जब राजनीतिज्ञों में तीव्र वैचारिक मतभेद होते थे लेकिन वह एक-दूसरे का विनम्रता से अभिवादन करते थे। संसद या सार्वजनिक समारोहों में सद्भावनापूर्ण भेंट करते थे। यहां तक कि एक साथ भोजन भी करते थे। ऐसे कई उदाहरण भारत की राजनीति में मिलते रहे हैं लेकिन अब ऐसा विनम्र व्यवहार राजनीति से गायब हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपशब्द कहा जाना पहले ही एक मुद्दा बन चुका है। बिहार में कांग्रेस और राजद के मंच से एक व्यक्ति ने प्रधानमंत्री मोदी की मां के लिए अपशब्द कहे थे। इस मामले को लेकर स्वयं प्रधानमंत्री ने तीखा हमला बोला था और कहा था कि मैं भले ही इन लोगों को माफ कर दूं लेकिन बिहार की जनता इन्हें माफ नहीं करेगी। इस मामले पर विवाद बढ़ा तो बिहार कांग्रेस ने एआई से बनाया गया एक वीडियो जारी किया। इस वीडियो के जरिये कांग्रेस पीएम मोदी पर मां के नाम पर राजनीति करने का आरोप लगाना चाहती थी। इस मामले पर भाजपा समर्थकों की ओर से कांग्रेस के विरुद्ध एफआईआर भी कराई गई थी। भाजपा ने इसे प्रधानमंत्री मोदी की मां का अपमान बताया। इस पर कांग्रेस का कहना था िक वीडियो में हमने कहीं भी प्रधानमंत्री की मां का अपमान नहीं किया। सभ्य राजनीति की चाह रखने वाले लोगों को इस वीडियो से काफी हताशा भी हुई। मामला पटना हाईकोर्ट में पहुंचा। अदालत ने इस पर कड़ा रुख अपनाया और कांग्रेस के इस वीडियो को सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्मों से हटाने का निर्देश दिया। प्रधानमंत्री मोदी की मां अब इस दुनिया में नहीं है। उन्हें लेकर कांग्रेस को ऐसा वीडियो बनाना ही नहीं चाहिए था। पीएम मोदी और उनकी मां का एआई वीडियो बनाने के मामले को लेकर पद्मश्री मथुरभाई सवानी ने पीएम मोदी को एक पत्र लिखा था। इस पत्र में उन्होंने ऐसे वीडियो पर आपत्ति जताते हुए टेक्नोलॉजी के दुरुपयोग की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि इस तरह की तकनीक के इस्तेमाल को लेकर कोई नियम कानून जरूर बनाए जाने चाहिए। ऐसे वीडियो में जिस तरह का संवाद इस्तेमाल किया जा रहा है वो हमारे भारत में कभी नहीं होता है। हम लोग इस वीडियो में दिखाए गए संवाद से पीड़ित हैं, इसलिए हमने ये पत्र लिखा है। राजनीतिज्ञों की भाषा और सार्वजनिक विमर्श में जिस तरह की गिरावट आ रही है उससे लोकतंत्र की वह भावना आहत हो चुकी है जिसमें परस्पर विरोधी विचारों के स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने की सम्भावना हमेशा सम्माहित रहती है। हम इसका मूल कारण ढूंढें तो हम पाएंगे कि राजनीति में जिस तरह सत्ता के लिए सिद्धांतों की बलि चढ़ाई जा रही है, यह सब इसी का परिणाम है। गठबंधन सरकारों के दौर में राजनीति का सुविधापरक सामने आता गया। स्वार्थ और धन का लोभ बढ़ता गया। वैचारिक पक्ष कहीं पीछे रह गया आैर सामने आती गई अभद्र भाषा। भारतीय राजनीति उस अंधेरी गुफा में फंसती गई जहां कोई यह नहीं जानता कि कौन सच बोल रहा है और कौन सही मार्ग का अनुसरण कर रहा है। अगर हम संसद की बात करें तो वहां भी कई सदस्यों का व्यवहार निर्लजता की श्रेणी में आता है। स्वस्थ बहस की जगह आरोप-प्रत्यारोप और व्यक्तिगत कटाक्ष देखने को िमलते हैं। सोशल मीडिया ने इस गिरावट को और भी तेज कर दिया है। यदि राजनीतिक बहस का स्तर इसी तरह िगरता रहा तो आम नागरिक नीतिगत उद्देश्यों से दूर होते जाएंगे और लोकतंत्र केवल चुनाव की जंग तक सीमित हो जाएगा।अब सवाल यह है कि राजनीतिक दल इस गिरावट पर आत्म मंथन करेंगे? सवाल यह भी है कि राजनीति में िशष्टता वापिस आए तो कैसे? समाधान यह है कि बहस को व्यक्तिगत कटाक्षों और अभद्र भाषा से बचाया जाए और जनता को सार्थक विकल्प दिया जाए। राजनीतिक संवाद के स्तर पर ही लोकतंत्र की वास्तविकताएं सामने आएंगी। हम सब लोगों को भी यह मांग करनी चाहिए कि चुनाव प्रचार के दौरान शालीनता और विनम्रता बरती जाए ताकि युवा पीढ़ी के िलए राजनीतिज्ञ एक आदर्श बन सकें।

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