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    Home » शिवम पैलेस में मां को रिझाने गरबा और डांडिया ले उतरे सैकड़ों भक्त

    शिवम पैलेस में मां को रिझाने गरबा और डांडिया ले उतरे सैकड़ों भक्त

    मां भगवती जागरण के 22वें आयोजन में मानो मां मड़प में पधार भक्तों को दे रही आशीष
    Roaming ExpressBy Roaming ExpressSeptember 28, 2025 धर्म एवं आस्था

    अशोक झा, सिलीगुड़ी: मां भगवती जागरण समिति के तत्वावधान में शिवम पैलेश, बर्दवान रोड, सिलीगुड़ी में प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी 22 वें मां भगवती जागरण की रात भक्तिमय में सराबोर हो रहा है। भक्तों के बीच मां के आराधना के लिए पहुंचे वाराणसी से संजीव शर्मा, भुवनेश्वर से सुभांगी सोनी और कोलकोता से राहुल गहरवार के गीत के साथ भक्त नृत्य कर रहे है। माता रानी का रिझाने के लिए दूसरे दिन डांडिया ले गरबा के साथ भक्तों की टोली मंडप में पहुंची है। जिधर नजर दौड़ाए वहीं माता के भक्त डांडिया लेकर माता के धुन में थिरक रहे थे।
    **नवरात्रि में गरबा और डांडिया के माध्यम से माता रानी को मनाने की हो रही कोशिश
    *आज की नहीं सदियों से चली आ रही यह परंपरा :
    कहां से आया डांडिया और देवी शक्ति से कैसे जुड़ा? ये है पूरा इतिहास: दुर्गा पूजा आते ही डांडिया रास भी शुरू हो जाता है. वैसे तो डांडिया गुजरात से निकला है, लेकिन अब पूरे देश में इसका चलन चल गया है, पर क्या आप जानते हैं कि ये डांडिया आखिर आया कहां से है और यह देवी शक्ति से कैसे जुड़ गया? बताया जाता है कि देवी शक्ति को प्रसन्न करने के लिए डांडिया रास की परंपरा पौराणिक काल से ही चली आ रही है। देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा का महापर्व नवरात्र की शुरुआत हो चुकी है. भक्त अपने-अपने तरीके से माता रानी की आराधना में जुटे हैं. देश के पूर्वी हिस्से से निकला दुर्गा पूजा का आधुनिक स्वरूप अब पूरे देश में पहुंच चुका है तो गुजरात से निकला डांडिया रास और गरबा नृत्य की भी अब देश दुनिया में धूम मचती है. वास्तव में यह देवी की आराधना और उनका ध्यान खींचने का एक तरीका है. डांडिया और गरबा जैसे गुजरात के लोक नृत्य का सीधा संबंध मां दुर्गा से है. धार्मिक मान्यता है कि नवरात्र में ऐसी नृत्य साधना से देवी दुर्गा प्रसन्न होती हैं. आइए जान लेते हैं कि डांडिया कहां से आया और कैसे देवी शक्ति से जुड़ा? पौराणिक काल से जुड़ता है इतिहास
    देवी रानी को प्रसन्न करने के लिए डांडिया रास की परंपरा पौराणिक समय से ही विद्यमान है। वैसे रास परंपरा की शुरुआत द्वापर से ही मानी जाती है और श्रीकृष्ण-गोपियों की रास लीला के बारे में हर कोई जानता है भागवत पुराण (10.29.1) में भी जिक्र मिलता है कि द्वापर में श्रीकृष्ण गोपियों के साथ यह नृत्य करते थे स्कन्दपुराण के उत्तरार्ध 72.8589 में नवरात्र के नौ दिनों के दौरान माहौल को आनंदमय बताया गया है. शिवपुराण में (51.7382) इसे आनंद मंगल का उत्सव बताया गया है।यानी देवी की आराधना हर्ष और उल्लास के साथ-साथ तरह-तरह के नृत्य के जरिए करने की परंपरा नई नहीं है।
    मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हरिवंश पुराण में भी दो लोकप्रिय नृत्यों का जिक्र है। इन्हें दंड रसक और ताल रसक कहा गया है और ये नृत्य गुजरात में यादवों द्वारा किया जाता था. वैसे भी यादव श्रीकृष्ण के वंशज माने जाते हैं। यानी ये परंपरा श्रीकृष्ण से यादवों को विरासत में मिली होगी. हरिवंश पुराण के एक और अध्याय में एक नृत्य का जिक्र है। इसके अनुसार, इस नृत्य के दौरान महिलाएं ताली बजाती हैं। यह काफी कुछ गरबा से मिलता-जुलता है। ऐसे होती रही है शुरुआत: आधुनिक काल में डांडिया और गरबा की शुरुआत गुजरात से मानी जाती है. कुछ विद्वान इसे गुजरात के साथ ही राजस्थान से भी जोड़ते हैं. डांडिया और गरबा नृत्य अलग- अलग तरीके से होता है. डांडिया रास के जरिए देवी की आकृति का ध्यान होता है, जिससे सुख-समृद्धि का आभास होता है. डांडिया हो या गरबा नृत्य, इनसे पहले देवी की आराधना की जाती है. फिर देवी मां की प्रतिमा या तस्वीर के सामने मिट्टी के कलश में छेद कर दीप प्रज्वलित किया जाता है. कलश में चांदी का सिक्का भी डाला जाता है, इसी दीप की हल्की रोशनी में डांडिया और गरबा किया जाता है. हालांकि, आधुनिक समय में कलश की रोशनी की जगह चमक-धमक भरी बिजली की लाइटें ले चुकी हैं।सकारात्मक ऊर्जा का होता है संचार: ऐसा माना जाता है कि डांडिया नृत्य के दौरान एक-दूसरे की डांडिया लड़ने से जो ध्वनि पैदा होती है उससे पॉजिटिव एनर्जी आती है. इसके साथ ही आनंद और उल्लास का समावेश होता है और जीवन की नकारात्मकता समाप्त होती है. मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि कवि दयाराम और वल्लभ भट ने माता रानी को प्रसन्न करने के लिए गीत लिखे, जिन्हें गरबा कहा जाता है. गरबा नृत्य के दौरान डांडिया की जगह पर महिलाएं तीन तालियों का इस्तेमाल करती हैं. इससे भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।नृत्य से देवी को प्रसन्न करने की पौराणिक कथा
    जहां तक नृत्य से माता रानी की आराधना के जुड़ने का प्रश्न है तो मीडिया में इससे जुड़ी एक पौराणिक कहानी काफी प्रसिद्ध है. मान्यता है कि राक्षसों के राजा महिषासुर के पास ब्रह्मा जी वरदान मिला था कि कोई पुरुष उसे नहीं मार सकेगा. इसी के चलते उसने तीनों लोक में तबाही मचानी शुरू कर दी. इससे परेशान होकर देवता श्रीहरि विष्णु की शरण में पहुंचे. इसका समाधान यह निकाला गया कि ब्रह्मा, विष्णु और महादेव की शक्तियां मिलकर देवी दुर्गा के रूप में अवतार लेंगी. देवी अवतरित हुईं और लगातार नौ दिनों तक महिषासुर से युद्ध कर उसका संहार किया. इसके बाद दुनिया में शांति स्थापित करने के लिए देवी दुर्गा को धन्यवाद प्रेषित करने को नृत्य का सहारा लिया गया। महाराक्षस से मुक्ति मिलने के बाद दुनिया उल्लास और आनंद में डूब गई और नृत्य के जरिए माता रानी की आराधना करने लगी।

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