– दुर्गाष्टमी के दिन गौरी मां की पूजा करने से जीवन में प्राप्ति होती है सुख-शांति
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: शारदीय नवरात्र की महाअष्टमी 30 सितंबर यानी आज मनाई जा रही है। महाअष्टमी को दुर्गा अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की पूजा की जाती है। दुर्गाष्टमी के दिन गौरी मां की पूजा करने से जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति होती है। वहीं, महाअष्टमी नवरात्र के सबसे खास दिन में से एक माना जाता है. भक्त इस दिन अपने घरों में कन्या पूजा और कुमारी पूजा करके नवरात्र का पारण करते हैं. इस दिन कन्या पूजन करने से मनोवांछित फल मिलता है, जिससे जीवन में सुख और समृद्धि बढ़ती है. चलिए अब जानते हैं कि शारदीय नवरात्र की महाअष्टमी पर आज कन्या पूजन और संधि पूजन का क्या मुहूर्त रहने वाला है।महाअष्टमी पर कन्या पूजन मुहूर्त : शारदीय नवरात्र की महाअष्टमी की तिथि की शुरुआत 29 सितंबर यानी कल शाम 4 बजकर 31 मिनट पर हो चुकी है और तिथि का समापन 30 सितंबर यानी आज शाम 6 बजकर 06 मिनट पर होगा।महाअष्टमी पर आज कन्या पूजन का पहला मुहूर्त सुबह 5 बजकर 01 मिनट से लेकर सुबह 6 बजकर 13 मिनट तक रहेगा. दूसरा मुहूर्त सुबह 10 बजकर 41 मिनट दोपहर 12 बजकर 11 मिनट रहेगा. साथ ही, अभिजीत मुहूर्त भी कन्या पूजन जैसे कार्यों के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है, जो कि सुबह 11 बजकर 47 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक रहेगा. इन तीनों मुहूर्तों में आज आप कन्या पूजन कर सकते हैं।
महाअष्टमी पर कैसे किया जाता है कन्या पूजन?: महाअष्टमी के कन्या पूजन में कम से कम 9 कन्याएं और 1 छोटा लड़का आमंत्रित करना चाहिए. इनको एक दिन या दो दिन पहले कन्याओं के घर जाकर सम्मानपूर्वक आमंत्रण देना चाहिए. जब कन्याएं आपके घर आएं तो सबसे पहले उनके पैरों को साफ पानी से धोएं, अच्छे से तिलक लगाएं और उन्हें आरामदायक जगह पर बैठाएं. अगर संभव हो तो चुनरी उड़ाकर उनका सम्मान करें. उसके बाद उनकी पसंद का स्वच्छ, शुद्ध और स्वादिष्ट भोजन बनाएं. भोजन के बाद कन्याओं को अपने सामर्थ्य के अनुसार उपहार दें और उनके पैर छूकर आशीष लें.
महाअष्टमी कन्या पूजन के नियम : नवरात्र में सभी तिथियों को एक-एक और अष्टमी या नवमी को नौ कन्याओं की पूजा होती है. इस दिन 2 वर्ष की कन्या (कुमारी) के पूजन से दुख और दरिद्रता मां दूर करती हैं. 3 वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति रूप में पूजा जाता है. त्रिमूर्ति कन्या का पूजन करने से घर में धन-समृद्धि आती है. 4 वर्ष की कन्या को कल्याणी माना जाता है. इसकी पूजा से परिवार का कल्याण होता है. जबकि, 5 वर्ष की कन्या रोहिणी कहलाती है. रोहिणी को पूजने से व्यक्ति रोगमुक्त हो जाता है। 6 वर्ष की कन्या को कालिका रूप में पूजा जाता है. कालिका रूप से विद्या, विजय, राजयोग की प्राप्ति होती है. 7 वर्ष की कन्या का रूप चंडिका कहलाता है. चंडिका रूप का पूजन करने से घर में ऐश्वर्य आता है. 8 वर्ष की कन्या शाम्भवी कहलाती है. इनका पूजन करने से वाद-विवाद में विजय प्राप्त होती है. 9 वर्ष की कन्या दुर्गा कहलाती है. इसका पूजन करने से शत्रुओं का नाश होता है. 10 वर्ष की कन्या सुभद्रा कहलाती है. सुभद्रा अपने भक्तों के सारे मनोरथ पूर्ण करती हैं।कहते हैं कि नवरात्रि की महाष्टमी पर कन्या पूजन करने से भक्तों की सारी मनोकामानएं पूरी हो जाती हैं. इस साल शारदीय नवरात्र में अष्टमी तिथि का कन्या पूजन मंगलवार, 30 अक्टूबर को किया जाएगा. आइए जानते हैं कि अष्टमी पर कन्या पूजन की विधि और शुभ मुहूर्त क्या रहने वाले हैं.
मां महागौरी की पूजा : अष्टमी पर कन्या पूजन से पहले माता महागौरी की पूजा होती है. यह पूजा पीले रंग के वस्त्र धारण करके करनी चाहिए. इस दिन सुबह स्नानादि के बाद सबसे पहले देवी मां के सामने एक घी का दीपक जलाएं और उनका ध्यान करें. पूजा में देवी को सफेद या पीले रंग के फूल अर्पित करें. देवी को फल और मिठाई का भोग लगाएं. इसके बाद देवी की आरती उतारें और अपनी मनोकामना कहें.
अष्टमी पर कन्या पूजन की विधि : नवरात्र का महापर्व केवल व्रत और तपस्या का त्योहार नहीं है, यह नारी शक्ति और कन्याओं के सम्मान का भी उत्सव है. इसलिए नवरात्र की अष्टमी और नवमी तिथि पर कन्या पूजन की परंपरा भी है. अष्टमी और नवमी तिथि पर छोटी-छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर पूजा जाता है. अष्टमी-नवमी से एक दिन पूर्व इन कन्याओं को घर आने का निमंत्रण दिया जाता और फिर अगले दिन सुबह शुभ मुहूर्त में इनकी विधिवत पूजा होती है.
घर में प्रवेश करते ही कन्याओं पर फूलों की वर्षा होती है. इनके चरणों को जल से धोया जाता है। फिर घर में एक स्थान पर बिठाकर उन्हें इन्हें तिलक लगाया जाता है। हाथ पर कलावा बांधा जाता है. देवी स्वरूप इन कन्याओं को खाने के लिए हलवा-पूरी और चने का प्रसाद दिया जाता है. आखिर में सामर्थ्य के अनुसार आप इन्हें कोई उपहार भी दे सकते हैं. अंत में देवी की जयकारे लगाकर इन कन्याओं का आशीर्वाद लिया जाता है। कन्या पूजन का शुभ मुहूर्त: इस साल अष्टमी तिथि पर कन्या पूजन के तीन शुभ मुहूर्त रहने वाले हैं. आप अपनी सुविधानुसार किसी भी शुभ मुहूर्त में कन्या पूजन कर सकते हैं.
पहला शुभ मुहूर्त- 5 बजकर 01 मिनट से लेकर सुबह 6 बजकर 13 मिनट।दूसरा शुभ मुहूर्त- सुबह 10 बजकर 41 मिनट दोपहर 12 बजकर 11 मिनट।
तीसरा शुभ मुहूर्त- सुबह 11 बजकर 47 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक। क्या है इसका व्रतकथा: आज यानी 30 सितंबर को शारदीय नवरात्रि का आठवां दिन है, जिसे अष्टमी या महाअष्टमी भी कहा जाता है. इस तिथि का नवरात्रि में विशेष महत्व माना जाता है, क्योंकि इस दिन लोग कन्या पूजन का आयोजन करते हैं और कन्या पूजन के बिना नवरात्रि का व्रत अधूरा माना जाता है।अपनी इसी इच्छा की पूर्ति के लिए उसने अमर होने का वरदान हासिल करने के लिए ब्रह्मा जी की घोर तपस्या आरंभ की। महिषासुर द्वारा की गई इस कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और उसे मनचाहा वरदान मांगने को कहा, ऐसे में महिषासुर, जो सिर्फ अमर होना चाहता था। उसने ब्रह्मा जी से वरदान मांगते हुए खुद को अमर करने के लिए उन्हें बाध्य कर दिया। परन्तु ब्रह्मा जी ने महिषासुर को अमरता का वरदान देने की बात ये कहते हुए टाल दी कि जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद जन्म निश्चित है, इसलिए अमरता जैसी किसी बात का कोई अस्तित्व नहीं है। जिसके बाद ब्रह्मा जी की बात सुनकर महिषासुर ने उनसे एक अन्य वरदान मांगने की इच्छा जताई और कहा- कि ठीक है स्वामी, यदि मृत्यु होना तय है तो मुझे ऐसा वरदान दे दीजिए कि मेरी मृत्यु किसी स्त्री के हाथ से ही हो, इसके अलावा अन्य कोई दैत्य, मानव या देवता, कोई भी मेरा वध ना कर पाए। जिसके बाद ब्रह्मा जी ने महिषासुर को दूसरा वरदान दे दिया। ब्रह्मा जी द्वारा वरदान प्राप्त करते ही महिषासुर अहंकार से अंधा हो गया और इसके साथ ही बढ़ गया उसका अन्याय। मौत के भय से मुक्त होकर उसने अपनी सेना के साथ पृथ्वी लोक पर आक्रमण कर दिया, इससे धरती पर चारों तरफ से तबाही मच गई। उसके बल के आगे समस्त जीवों और प्राणियों को नतमस्तक होना ही पड़ा। जिसके बाद पृथ्वी और पाताल को अपने अधीन करने के बाद अहंकारी महिषासुर ने इन्द्रलोक पर भी आक्रमण कर दिया, जिसमें उन्होंने इन्द्र देव को पराजित कर स्वर्ग पर भी कब्ज़ा कर लिया। महिषासुर से परेशान होकर सभी देवी-देवता त्रिदेवों अर्थात महादेव, ब्रह्मा और विष्णु के पास सहायता मांगने पहुंचे। इस पर विष्णु जी ने उसके अंत के लिए देवी शक्ति के निर्माण की सलाह दी। जिसके बाद सभी देवताओं ने मिलकर देवी शक्ति को सहायता के लिए पुकारा और इस पुकार को सुनकर सभी देवताओं के शरीर में से निकले तेज ने एक अत्यंत खूबसूरत सुंदरी का निर्माण किया। उसी तेज से निकली मॉं आदिशक्ति जिसके रूप और तेज से सभी देवता भी आश्चर्यचकित हो गए।त्रिदेवों की मदद से निर्मित हुई देवी दुर्गा को हिमवान ने सवारी के लिए सिंह दिया और इसी प्रकार वहां मौजूद सभी देवताओं ने भी मां को अपने एक-एक अस्त्र-शस्त्र सौंपे और इस तरह स्वर्ग में देवी दुर्गा को इस समस्या हेतु तैयार किया गया। माना जाता है कि देवी का अत्यंत सुन्दर रूप देखकर महिषासुर उनके प्रति बहुत आकर्षित होने लगा और उसने अपने एक दूत के जरिए देवी मॉं के पास विवाह का प्रस्ताव तक पहुंचाया। अहंकारी महिषासुर की इस ओच्छी हरकत ने देवी भगवती को अत्याधिक क्रोधित कर दिया, जिसके बाद ही मॉं ने महिषासुर को युद्ध के लिए ललकारा। मां दुर्गा से युद्ध की ललकार सुनकर ब्रह्मा जी से मिले वरदान के अहंकार में अंधे हो चुके महिषासुर उनसें युद्ध करने के लिए तैयार भी हो गया। इस युद्ध में एक-एक करके महिषासुर की संपूर्ण सेना का मां दुर्गा ने सर्वनाश कर दिया। इस दौरान माना ये भी जाता है कि ये युद्ध पूरे नौ दिनों तक चला। जिस दौरान असुरों के सम्राट महिषासुर ने विभिन्न रूप धरकर देवी मां को छलने की कई बार कोशिश की, लेकिन उसकी सभी कोशिश आखिरकार नाकाम रही और देवी भगवती ने अपने चक्र से इस युद्ध में महिषासुर का सिर काटते हुए उसका वध कर दिया। अंत: इस तरह देवी भगवती के हाथों महिषासुर की मृत्यु संभव हो पाई। माना जाता है कि जिस दिन मां भगवती ने स्वर्ग लोक, पृथ्वी लोक और पाताल लोक को महिषासुर के पापों से मुक्ति दिलाई उस दिन से ही दुर्गा अष्टमी का पर्व प्रारम्भ हुआ।








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