– सजावट के लिए जा रहे लोग SIKKIM को HARDWARE और Orbit Sanitations, प्रसाद के लिए प्रीमियम डालमिया
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: सरस्वती पूजा यह पर्व मौसम में आने वाले बदलाव का संकेत देता है, ज्ञान, कला, सृजन और नए आरंभ का प्रतीक माना जाता है। हिंदुओं द्वारा मनाया जाने वाला यह पर्व विभिन्न समुदायों में सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से भी अपनाया गया है। पंचांग के अनुसार वसंत पंचमी माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को आती है। इस साल यह पर्व शुक्रवार, 23 जनवरी को मनाया जाएगा, जबकि पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 7:13 बजे से दोपहर 12:33 बजे (IST) तक रहेगा। अगर आप पूजा का बड़ा आयोजन करना है। प्रसाद बनाना है। जगह को सजाना है, खूबसूरत बनाना है तो डालमिया प्रीमियम आटा, मैदा और सूजी लाना है। इतना ही नहीं SIKKIM को HARDWARE और Orbit Sanitations जरूर जाना। मेरी बात मान कर देखो यह पुजा कितना पावन और सुहावन बन जाएगा। वसंत पंचमी की उत्पत्ति प्राचीन भारत से हुई, यह दिन बसंत ऋतु के स्वागत का संकेत था। यह समय होली से लगभग 40 दिन पहले आता है और प्रकृति के पुनर्जागरण का दौर शुरू होता है। हिमनदों के पिघलने से नदियां उफान पर होती हैं, खेतों में फसलें लहलहाने लगती हैं और सरसों के पीले फूल धरती को सुनहरे रंग में रंग देते हैं।
इस पर्व का संबंध प्राचीन सरस्वती नदी से भी जोड़ा जाता है, जिसके तटों पर ऋषि-मुनियों के आश्रम थे। इन्हीं स्थानों पर वेद व्यास जैसे महर्षियों ने वेद और उपनिषद जैसे ग्रंथों की रचना की। समय के साथ सरस्वती नदी ज्ञान और विद्या की प्रतीक बनी और वसंत पंचमी का संबंध देवी सरस्वती की उपासना से स्थापित हो गया।
कालांतर में वसंत पंचमी केवल ऋतु परिवर्तन का पर्व न रहकर धार्मिक महत्व भी प्राप्त करने लगी। मान्यता है कि इसी दिन देवी सरस्वती का प्राकट्य हुआ था, इसलिए यह दिन विद्यार्थियों, शिक्षकों, विद्वानों, कलाकारों और संगीतज्ञों के लिए विशेष माना जाता है।
दक्षिण भारत में इसे श्री पंचमी के रूप में मनाया जाता है, जहां देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। कुछ क्षेत्रों में इसका संबंध पार्वती और सृजनात्मक ऊर्जा से जोड़ा जाता है। एक प्रचलित कथा के अनुसार पार्वती ने कामदेव से शिव को समाधि से जाग्रत करने का आग्रह किया। कामदेव ने बसंत का सृजन किया, लेकिन शिव के तीसरे नेत्र से भस्म हो गए। बाद में वे निराकार रूप में पुनर्जीवित हुए। इसी कारण कुछ स्थानों पर इसे मदन पंचमी भी कहा जाता है। लोककथा के अनुसार, महान कवि कालिदास को पहले अल्पबुद्धि माना जाता था उन्हें इसी दिन देवी सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त हुआ और वे अद्वितीय साहित्यकार बने।
वसंत पंचमी का प्रभाव केवल हिंदू समाज तक सीमित नहीं रहा। मध्यकाल में इसका असर सूफी परंपराओं में भी दिखा। प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो ने पीले फूलों के साथ दिल्ली स्थित निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर चादर चढ़ाने की परंपरा शुरू की, जो आज भी जारी है। सिख समुदाय इस दिन ऐतिहासिक घटनाओं को स्मरण करता है और पीले वस्त्र धारण करता है। जैन धर्म में आचार्य कुंदकुंद स्वामी का स्मरण किया जाता है। यह पर्व भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, बाली (इंडोनेशिया) और प्रवासी भारतीय समुदायों में भी मनाया जाता है। वसंत पंचमी की सबसे प्रमुख पहचान पीला रंग है। यह रंग सरसों की फसल, सूर्यप्रकाश, आशा और शांति का प्रतीक है। धार्मिक रूप से पीला रंग ज्ञान और स्पष्टता को दर्शाता है, जो देवी सरस्वती के गुणों से जुड़ा है। इस दिन प्रातः स्नान, पीले वस्त्र धारण करना, सरस्वती पूजा, पुस्तकों और वाद्ययंत्रों की आराधना तथा पीले व्यंजन ग्रहण करने की परंपरा है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में पढ़ाई स्थगित कर ज्ञान के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है। कई स्थानों पर विद्यारंभ या हाते-खोरी संस्कार के तहत बच्चों को पहली बार अक्षर ज्ञान कराया जाता है। पश्चिम बंगाल और बिहार में भव्य सरस्वती पूजा होती है, पंजाब में पतंगबाजी और मेले लगते हैं, ओडिशा में हवन और शिक्षा संस्कार होते हैं, राजस्थान में पुष्प परंपराएं निभाई जाती हैं, महाराष्ट्र में नवविवाहित मंदिर दर्शन करने जाते हैं, गुजरात के कच्छ में कृष्ण-राधा भक्ति गीत गाए जाते हैं, उत्तराखंड में फसलों की पूजा होती है, बाली में विद्यालयों में विशेष अर्पण किए जाते हैं, जबकि लाहौर में पतंगबाजी की परंपरा रही है। बिहार के देव-सूर्य मंदिर में सूर्य उपासना विशेष रूप से होती है।
ज्योतिषीय दृष्टि से वसंत पंचमी को अभूझ मुहूर्त माना जाता है, जिसमें विवाह, शिक्षा, व्यापार और नए कार्य बिना विशेष गणना के आरंभ किए जा सकते हैं। आज के समय में यह पर्व जीवन में संतुलन, रचनात्मकता और ज्ञान के महत्व की याद दिलाता है। वसंत पंचमी केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि यह संदेश देती है कि हर ठहराव के बाद नव सृजन संभव है। अज्ञान पर ज्ञान की, जड़ता पर रचनात्मकता की और शीत पर वसंत की विजय के रूप में इस पर्व को मनाया जाता है।









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