
अशोक झा/ कोलकाता: शारदीय नवरात्रि वह पावन पर्व है जब देवी के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। यह पर्व हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है. ‘नवरात्रि’ संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है ‘नौ विशेष तिथियों का समूह.’ यह शब्द केवल समय बताने के लिए नहीं बल्कि इस दौरान किए जाने वाले कर्मों का संकेत देता है। भगवती दुर्गा की पूजा-उपासना करते समय भक्त को अपना मुख हमेशा पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर रखना चाहिए। नवरात्रि में भक्त मां भगवती की प्रतिमा के समक्ष अखण्ड ज्योति जलाते है, अखण्ड ज्योति के दीपक को वास्तुशास्त्र के अनुसार दक्षिण-पूर्व, अग्निकोण में स्थापित करना चाहिए। घर में यदि श्रीयन्त्र स्थापित हो तो उसकी नवरात्र में पूजा अवश्य करनी चाहिए और यदि न हो ता श्रीयन्त्र स्थापित करने का यह सबसे अच्छा मुहूर्त है। मां दुर्गा की मूर्ति अथवा तस्वीर को साफ-सुथरा, स्वच्छ रखना चाहिए। नवरात्रि के समय रोज़ गूगुल की धूप और लाल गुड़हल के फूलों की माला मां को अर्पण करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। मां को चढ़ाने वाले फूल ताजे और सुगंधित होने चाहिए, कटे-फटे या किसी भी प्रकार से दूषित फूल देवी को नहीं चड़ाने चाहिए। मां दुर्गा की पूजा गीले अथवा फटे-पुराने वस्त्र पहनकर नहीं करनी चाहिए, सूखे, साफ-सुथरे वस्त्र पहनकर ही देवी आराधना करें। नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का पाठ अथवा अनुष्ठान के बीच में परिवार में किसी को भी बाल तथा नाखून काटना एवं पुरूषों को दाड़ी बनवाने से परहेज करना चाहिए। मां की पूजा के स्थल पर ज्यादा वजनदार वस्तुओं को रखना अनुचित माना गया है, पूजाघर को स्टोररूम नहीं बनाना चाहिए न ही स्टोररूम में मूर्तियां रखकर पूजा करनी चाहिए। देवी के जिस स्वरूप की आराधना आप कर रहे हैं, उसका ध्यान मन ही मन अवश्य करते रहना चाहिए।
घर में अगर मां दुर्गा की दो तस्वीर या मूर्तियां हैं, तो उन्हें हमेशा साफ-सुथरा रखें और बराबर नमन करते रहें। धन प्राप्ति के लिए अगर नवरात्र में आप माता महालक्ष्मी की आरधना करते हैं, तो विशेष लाभ के लिए माता की मूर्ति स्फटिक की होनी चाहिए।
घर में देवी दुर्गा जी की तीन मूर्तियां वर्जित हैं, अर्थात् घर या पूजा घर में देवी की तीन मूर्तियाँ एक साथ नहीं होनी चाहिए।
नवरात्रि को शक्ति साधना का सबसे पवित्र पर्व माना गया है। शारदीय और चैत्र नवरात्रि विशेष रूप से पूरे भारत में बड़े श्रद्धा भाव से मनाए जाते हैं। देवी भागवत और मार्कंडेय पुराण में वर्णित है कि देवी दुर्गा ही सृष्टि की सृजनकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं। इन नौ दिनों में माता के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना का विधान है, जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है। प्रत्येक दिन देवी के एक विशेष रूप की उपासना कर भक्त भिन्न-भिन्न फल और सिद्धियां प्राप्त करते हैं।
प्रथम दिन-मां शैलपुत्री: नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। पर्वतराज हिमालय की कन्या और वृषभ पर सवार इनका स्वरूप साधक को आत्मबल और स्थिरता प्रदान करता है।
द्वितीय दिन- मां ब्रह्मचारिणी: दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी की उपासना होती है। ये तपस्या और संयम की प्रतीक हैं। इनके पूजन से साधक में धैर्य, त्याग और ज्ञान की वृद्धि होती है। 1
तीसरा दिन – शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा की पूजा करनी चाहिए। इन देवी की पूजा से भय और संकट दूर होते हैं। मां को दूध या खीर का भोग लगाएं, लाल गुलाब के फूल अर्पित करें और लाल रंग इस दिन विशेष महत्व रखते हैं। देवी चंद्रघंटा का मंत्र है “ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः” ।
चौथा दिन – शारदीय नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा होती है। इनकी पूजा से आयु, यश और बल प्राप्त होता है। इस दिन मालपुआ का भोग लगाएं, गेंदा फूल चढ़ाएं और नीले रंग का वस्त्र धारण करें। कूष्मांडा देवी का मंत्र है “ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः”: पांचवा दिन – शारदीय नवरात्रि की पंचमी तिथि पर स्कंदमाता माता की पूजा होती है। स्कंदमाता की पूजा से संतान सुख और घर में शांति मिलती है। इनकी पूजा में केले का भोग गाएं, पीला चमेली फूल चढ़ाएं। इस दिन पीला रंग पहनना शुभ माना जाता है। देवी का पूजा मंत्र है “ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः”।छठा दिन – छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा होती है। इनकी पूजा में शहद का भोग लगाया जाता है, कमल के फूल अर्पित करना और हरा वस्त्र पहनना शुभ होता है। देवी का पूजा मंत्र है “ॐ देवी कात्यायन्यै नमः” ।
सातवां दिन – शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन देवी कालरात्रि की पूजा होती है। इनकी पूजा शत्रुओं का नाश होता है और भय दूर होता है। मां को लाल गेंदा फूल अर्पित करें और गुड़ का भोग लगाएं। ग्रे रंग इस दिन सबसे श्रेष्ठ हैं। “ॐ देवी कालरात्र्यै नमः” का जप करते हुए मां कालरात्रि की पूजा करें।
आठवां दिन – शारदीय नवरात्रि की अष्टमी तिथि पर माता महागौरी को नारियल का भोग लगाकर पूजा करें। पूजा में सफेद फूल अर्पित करें और गुलाबी रंग पहनना उत्तम होता है। “ॐ देवी महागौर्यै नमः” मंत्र का जाप करते हुए महागौरी की पूजा करें। नौवां दिन – नवमी तिथि पर सिद्धिदात्री माता की पूजा होती है। मां को हलवा-पूरी का भोग लगाया जाता है। चमेली के फूल अर्पित किए जाते हैं। मां सिद्धिदात्री को आसमानी रंग प्रिय हैं। इन देवी का मंत्र है “ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः”। के साथ पूजा का अंत होता है।
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