
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: नवरात्र का पर्व मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की साधना और उपासना का विशेष अवसर माना जाता है। हर दिन माता के एक अलग रूप की पूजा की जाती है। पंचमी तिथि को मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप, मां स्कंदमाता की पूजा का विधान है।।स्कंदमाता शब्द का अर्थ है- भगवान स्कंद (यानी कार्तिकेय जी) की माता। इसीलिए देवी को यह नाम प्राप्त हुआ था। आध्यात्मिक महत्व: नवरात्रि की पंचमी को साधक का मन ‘विशुद्ध चक्र’में स्थित हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन साधक की लौकिक व सांसारिक चित्तवृत्तियां शांत हो जाती हैं और वह परम चैतन्य की ओर अग्रसर होता है। मां स्कंदमाता की आराधना से साधक का मन देवी स्वरूप में पूर्णत: तल्लीन होकर आध्यात्मिक उन्नति को प्राप्त करता है। पूजा का फल: स्कंदमाता की साधना से आरोग्य, बुद्धिमत्ता और ज्ञान की प्राप्ति होती है। उनकी उपासना से सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं और भक्त को सुख-शांति मिलती है। विशेषता यह है कि इनकी पूजा करने से भगवान कार्तिकेय की भी स्वत: उपासना हो जाती है। सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनके उपासक में दिव्य कांति और तेज का संचार होता है। संतान सुख और रोगमुक्ति के लिए स्कंदमाता की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। पूजा विधि: पंचमी के दिन मां के श्रृंगार में सुंदर रंगों का प्रयोग करना चाहिए। विनम्रता के साथ देवी स्कंदमाता और बाल कार्तिकेय की पूजा करनी चाहिए। कुमकुम, अक्षत, पुष्प, फल और चंदन से पूजन करें तथा घी का दीपक जलाएं। इस दिन मां दुर्गा को केले का भोग अर्पित करने का विशेष महत्व है। भोग का प्रसाद ब्राह्मण को दान करने से बुद्धि का विकास होता है और साधक जीवन में प्रगति प्राप्त करता है। मां स्कंदमाता के मंत्र
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
या देवी सर्वभूतेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।
स्कंददेव उनकी गोद में विराजमान हैं। वे स्वयं कमल के आसन पर विराजमान हैं। इसी कारण देवी स्कंदमाता को पद्मासना देवी भी कहा जाता है। उनका वाहन सिंह है। मान्यता है कि देवी भगवती के पाँचवें स्वरूप की पूजा करने से संतान संबंधी समस्याएँ दूर होती हैं। स्कंदमाता पूजा विधि: सूर्योदय से पहले उठें, स्नान करें और फिर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। अपने घर के पूजा कक्ष या मंदिर में एक चबूतरे पर माँ स्कंदमाता की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें। माँ स्कंदमाता को गंगा जल से स्नान कराएँ और षोडशोपचार पूजा करें। माँ स्कंदमाता को कमल का फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। “ॐ देवी स्कंदमाताये नमः” मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें। माँ स्कंदमाता की आरती करें और दुर्गा सप्तशती या देवी कवच का पाठ करें।
स्कंदमाता को भोग
माँ स्कंदमाता को केले का भोग प्रिय है। आप केसर युक्त खीर का भी भोग लगा सकते हैं। उन्हें पीली वस्तुएँ प्रिय हैं, इसलिए पूजा में पीले फल, वस्त्र और अन्य रंगों का प्रयोग करें।
स्कंदमाता मंत्र
ॐ देवी स्कंदमाताये नमः
शिशाशन-गता नित्यं पद्माश्रितकार्द्वया
सदैव सौभाग्यशाली, देवी स्कंदमाता, महिमावान।
हे देवी, सभी प्राणी माता के स्वरूप में हों।
नमस्कार, नमस्ते, नमस्ते, नमस्ते, नमः।
स्कंदमाता की कथा
तारकासुर ने कठोर तपस्या से ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया था। प्रसन्न होकर ब्रह्माजी उसके समक्ष प्रकट हुए। ब्रह्माजी को देखकर तारकासुर ने भगवान से अमरता का वरदान माँगा। यह वरदान सुनकर ब्रह्माजी बोले, “हे पुत्र, इस पृथ्वी पर जो भी जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है।” ब्रह्माजी के वचनों से निराश होकर तारकासुर ने ब्रह्माजी से पुनः प्रार्थना की, “हे प्रभु, मैं ऐसा कुछ करूँगा जिससे मेरी मृत्यु भगवान शिव के पुत्र के हाथों हो।” उसके मन में यह विचार था कि भगवान शिव का कभी विवाह नहीं होगा और न ही उनका कोई पुत्र होगा। परिणामस्वरूप, उनकी मृत्यु नहीं हो सकेगी। तब ब्रह्माजी ने कहा, “ऐसा ही हो,” और अंतर्ध्यान हो गए। इसके बाद तारकासुर ने अपने अत्याचारों से संपूर्ण पृथ्वी और स्वर्ग को त्रस्त कर दिया। सभी उसके अत्याचारों से तंग आ चुके थे। व्यथित होकर देवता भगवान शिव के पास गए। हाथ जोड़कर उन्होंने उनसे तारकासुर से मुक्ति की विनती की। भगवान शिव ने पार्वती से विवाह किया और कार्तिकेय के पिता बने। बाद में भगवान कार्तिकेय ने बड़े होकर तारकासुर का वध किया। आपको बता दें कि स्कंदमाता कार्तिकी ही माता हैं। इसके अलावा, देवी कात्यायनी की आराधना से भय, रोगों और जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति मिलती है. उनकी पूजा से मानसिक शांति मिलती है और सभी बाधाओं का नाश होता है.
माँ कात्यायनी की पूजा से होने वाले लाभ:-
माँ कात्यायनी की पूजा का विशेष महत्व है. खासकर अविवाहित कन्याओं के लिए. कहा जाता है कि जो कन्याएं माँ कात्यायनी की पूजा करती हैं, उनके शादी के योग जल्दी बनते हैं और विवाह के मार्ग में रुकावटें दूर होती हैं. इसके अलावा, देवी कात्यायनी की आराधना से भय, रोगों और जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति मिलती है. उनकी पूजा से मानसिक शांति मिलती है और सभी बाधाओं का नाश होता है.
मां कात्यायनी का स्वरूप: मां दुर्गा का यह स्वरूप अत्यंत दिव्य है. इनका रंग सोने के समान चमकीला है तो इनकी चार भुजाओं में से ऊपरी बाएं हाथ में तलवार और नीचले बाएं हाथ में कमल का फूल है. जबकि इनका ऊपर वाला दायां हाथ अभय मुद्रा में है और नीचे का दायां हाथ वरदमुद्रा में है। मां कात्यायनी की कथा: पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि कात्यायन संतान की इच्छा से मां भगवती की कठोर तपस्या कर रहे थे. उनकी गहन साधना से प्रसन्न होकर देवी ने प्रकट होकर उन्हें वरदान दिया कि वह उनके घर पुत्री रूप में जन्म लेंगी. इसी कारण जब मां भगवती ने महर्षि कात्यायन के घर जन्म लिया तो वे कात्यायनी नाम से विख्यात हुईं। इसी समय महिषासुर नामक दैत्य अपने अत्याचारों से तीनों लोकों को परेशान कर रहा था. देवता, मनुष्य और ऋषि सभी उसके आतंक से त्रस्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुँचे. तब त्रिदेवों ने अपने-अपने तेज से देवी को उत्पन्न किया. यही देवी महर्षि कात्यायन के घर जन्मीं और कात्यायनी कहलाईं. महर्षि कात्यायन ने सप्तमी, अष्टमी और नवमी के दिन देवी कात्यायनी की विधिपूर्वक पूजा की. इसके बाद दशमी के दिन देवी ने सिंह पर सवार होकर महिषासुर के साथ भीषण युद्ध किया और उसका वध कर दिया. इस प्रकार उन्होंने देवताओं और समस्त प्राणियों को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाई। मां कात्यायनी की यह कथा न केवल उनके साहस और शक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि जब भी धर्म पर संकट आता है, तब देवी अपने दिव्य स्वरूप से प्रकट होकर अधर्म का नाश करती हैं और भक्तों की रक्षा करती हैं. मान्यता है कि माँ कात्यायनी की पूजा से विवाह में आने वाली बाधाएँ दूर हो जाती हैं और कन्याओं को मनचाहा वर प्राप्त होता है. उनकी उपासना से वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि आती है और जीवन में स्थिरता का आशीर्वाद मिलता है. यह भी माना जाता है कि माँ कात्यायनी की कृपा से साधक को साहस, आत्मविश्वास और जीवन की कठिनाइयों से उबरने की शक्ति मिलती है।








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