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    Home » यह दिन केवल किसी महापुरुष के जन्म का स्मरण मात्र नहीं बल्कि एक ऐसे युगपुरुष के आदर्शों का उत्सव : राजू विष्ट

    यह दिन केवल किसी महापुरुष के जन्म का स्मरण मात्र नहीं बल्कि एक ऐसे युगपुरुष के आदर्शों का उत्सव : राजू विष्ट

    Roaming ExpressBy Roaming ExpressNovember 5, 2025 धर्म एवं आस्था

     

    कहा, गुरु नानक देव का सम्पूर्ण जीवन समानता, सेवा, सत्य और प्रेम की शिक्षा देता

    अशोक झा/ सिलीगुड़ी: कार्तिक मास की पूर्णिमा को सिख धर्म के आदि संस्थापक, आध्यात्मिक क्रांति के अग्रदूत और मानवता के अमर संदेशवाहक गुरु नानक देव के जन्म दिवस को ‘गुरु नानक जयंती’ अथवा ‘प्रकाश पर्व’ के रूप में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया है। 5 नवम्बर को 556वां प्रकाश पर्व मनाने के लिए दार्जिलिंग के सांसद राजू विष्ट विधायक शंकर घोष के साथ सेवक रोड गुरुद्वारा पहुंचे। उन्होंने माथा टेकने के बाद कहा कि यह दिन केवल किसी महापुरुष के जन्म का स्मरण मात्र नहीं बल्कि एक ऐसे युगपुरुष के आदर्शों का उत्सव है, जिन्होंने अपने जीवन और उपदेशों से संसार को समानता, सत्य, करुणा और एकत्व का अद्वितीय संदेश दिया। गुरु नानक बचपन से ही असाधारण प्रतिभा और गहन आध्यात्मिक चिंतन के धनी थे। जब वे मात्र पांच वर्ष के थे, तब ही उन्हें धार्मिक चर्चाओं और कीर्तन में गहरी रुचि हो गई थी। उनके जीवन में कभी भी दिखावा या पाखंड को स्थान नहीं मिला। वे हर कार्य के मूल में सत्य और यथार्थ की खोज करते थे। नौ वर्ष की आयु में जब उनके पिता कालूचंद खत्री ने यज्ञोपवीत संस्कार हेतु पुरोहित बुलाया, तब नानक ने बड़े विनम्र परन्तु गूढ़ प्रश्न पूछे, ‘क्या यह सूत का जनेऊ मनुष्य को मोक्ष दिला सकता है? जब शरीर नश्वर है, तो यह धागा भी शरीर के साथ नष्ट हो जाएगा, फिर यह कैसे आत्मा के साथ जा सकता है?’ उनके इन शब्दों ने उपस्थित जनों को सोचने पर विवश कर दिया। वे तभी से अंधविश्वास और बाह्य आडम्बरों के प्रखर विरोधी बन गए थे। गुरु नानक का विवाह 19 वर्ष की आयु में गुरदासपुर के मूलचंद खत्री की पुत्री सुलखनी से हुआ परंतु उनका हृदय सांसारिक जीवन की सीमाओं से परे था। वे गृहस्थ रहते हुए भी संसार के मोह-माया से निर्लिप्त रहे। गुरु नानक ने अपने जीवन में पाखंड, अहंकार और अन्याय के विरुद्ध तीव्र स्वर उठाया। एक बार अमीर भागो ने उन्हें अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया परंतु नानक ने उसका निमंत्रण अस्वीकार कर एक गरीब मजदूर के घर भोजन करना स्वीकार किया। जब भागो ने उन्हें नीच कहकर अपमानित किया, तब नानक ने सहज परंतु तीखी शिक्षा दी, ‘मैं वह भोजन नहीं कर सकता, जो गरीबों के खून-पसीने से तैयार हुआ हो।’ उन्होंने एक हाथ में भागो के व्यंजन और दूसरे हाथ में मजदूर की रोटियां लेकर उन्हें निचोड़ा तो मजदूर की रोटी से दूध और भागो के पकवानों से रक्त टपका। वह दृश्य सबके लिए जीवनभर का सबक बन गया कि सच्चा भोजन वही है, जो ईमानदारी और परिश्रम से कमाया गया हो। गुरु नानक के जीवन की प्रत्येक घटना मानवता के मर्म को स्पर्श करती है।
    हरिद्वार में उन्होंने देखा कि लोग गंगा स्नान के बाद पूर्व दिशा में जल अर्पण कर रहे हैं। उन्होंने इसके विपरीत पश्चिम दिशा में जल फैंकना शुरू किया। जब लोगों ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा, ‘मैं अपने खेतों को पानी दे रहा हूं।’ भीड़ में हंसी गूंजी, तब गुरु नानक ने कहा, ‘जब मेरा जल पास के खेतों तक नहीं पहुंच सकता तो तुम्हारा जल इतनी दूर स्वर्गलोक में पूर्वजों तक कैसे पहुंचेगा?’ इस सहज उत्तर ने अंधविश्वास के आवरण को चीर दिया। उनका उद्देश्य किसी की आस्था का उपहास नहीं बल्कि उसे विवेक की रोशनी से प्रकाशित करना था। उनकी यात्राएं, जिन्हें ‘उदासियां’ कहा गया, मानवता के संदेश के प्रचार का माध्यम बनी। उन्होंने भारत, तिब्बत, श्रीलंका, अरब, ईरान और अफगानिस्तान तक भ्रमण किया। उनका लक्ष्य था मानव को धर्म की संकीर्ण परिभाषाओं से ऊपर उठाकर सच्चे ईश्वर और सच्चे जीवन की पहचान कराना।वे कहते थे, ‘एक ओंकार सतनाम’ यानी ईश्वर एक है और सत्य ही उसका नाम है। जब वे कपूरथला के सुल्तानपुर लोधी में वैन नदी के किनारे ध्यानमग्न थे, तब तीन दिन तक नदी में लीन रहे। जब वे पुनः प्रकट हुए तो उनके मुख से यही शब्द निकले, ‘एक ओंकार सतनाम।’ वहीं उन्होंने ईश्वर का साक्षात्कार किया और वहीं बोया गया बेर का बीज आज भी ‘गुरुद्वारा बेर साहिब’ के रूप में श्रद्धा का केंद्र है।
    उनके उपदेशों में मानवता का गूढ़ दर्शन निहित है। वे कहते थे, ‘एक पिता एकस के हम बारिक’ यानी संसार का समस्त जीव एक ही परमपिता की संतान है। उन्होंने ऊंच-नीच, जात-पात और अमीरी-गरीबी की दीवारों को तोड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, ‘ना कोई हिन्दू, ना मुसलमान’ अर्थात् सच्चा मनुष्य वही है, जो अपने भीतर ईश्वर का अंश पहचानता है। गुरु नानक की करुणा, उनकी दृष्टि और उनके चमत्कार केवल आस्था के प्रसंग नहीं बल्कि आत्मबोध के प्रतीक हैं।
    गुरु नानक देव का सम्पूर्ण जीवन समानता, सेवा, सत्य और प्रेम की शिक्षा देता है। उन्होंने ‘नाम जपो, किरत करो, वंड छको’, इन तीन मूल सिद्धांतों के माध्यम से जीवन का सार प्रस्तुत किया। उनका संदेश था ‘परमात्मा का स्मरण करो, ईमानदारी से कर्म करो और अपनी आय का हिस्सा दूसरों के साथ बांटो।’ उन्होंने कहा, ‘जिसने पराया दुख अपना समझा, वही सच्चा भक्त है।’ यह विचार युगों-युगों तक समाज को मानवीयता की राह दिखाते रहेंगे। उनका प्रकाश मानव चेतना के उस ऊंचे शिखर का प्रतीक है, जहां कोई भेद नहीं, केवल प्रेम है। गुरु नानक का यह संदेश आज भी उतना ही सजीव है ‘ना कोई ऊंचा, ना कोई नीचा; सब एक ज्योति के अंश हैं।’ गुरु नानक जयंती का पर्व हमें यही स्मरण कराता है कि संसार में भक्ति का सर्वोच्च रूप वही है, जो मानवता के कल्याण से जुड़ा हो। उनकी वाणी में निहित प्रकाश आज भी हमारे अंधकारमय समय में मार्गदर्शन की लौ बनकर जलता है।

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