
नेपाल बोर्डर से अशोक झा: पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में बीते दिन से हिंसा, पथराव, आगजनी और तोड़फोड़ का दौर जारी है। सोशल मीडिया बैन के ख़िलाफ़ युवाओं के प्रदर्शन ने ओली सरकार को पूरी तरह से हिला दिया। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली गृहमंत्री रमेश लेखक, कृषि मंत्री रामनाथ अधिकारी, स्वास्थ्य मंत्री के बाद अब राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल ने भी इस्तीफा दे दिया है। बालेंद्र शाह को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाने की मांग की जा रही है। इसकी जल्द घोषणा भी हो जाएगी। बालेंद्र शाह काठमांडू के मेयर हैं।बालेंद्र शाह नेपाल में युवाओं के बीच खासे लोकप्रिय हैं। यही वजह है कि बालेंद्र किसी भी अन्य मेयर से अलग हैं। युवाओं के बीच बालेंद्र के बड़े पैमाने पर फॉलोअर्स हैं। अक्सर सोशल मीडिया पर बालेंद्र की पोस्ट ट्रेंड करने के साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ देती हैं. बालेंद्र शाह ने अपने करियर की शुरुआत एक सिविल इंजीनियर के तौर पर की।फिर उन्होंने रैपर के रूप में अपनी किस्मत आजमाई। बलेन शाह का जन्म 27 अप्रैल 1990 को काठमांडू में हुआ था। वे एक मैथिल-मधेशी परिवार से हैं और नेपाल में हिप-हॉप और रैप संगीत के जानकार भी हैं।।उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त की है। साल 2022 में उन्होंने काठमांडू मेयर के चुनाव में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की। वे आधुनिक शहर प्रबंधन, कचरा प्रबंधन और अवैध निर्माण हटाने जैसी पहलों के लिए जाने जाते हैं। उनके काम ने उन्हें जनता में लोकप्रिय और विश्वासयोग्य नेता बना दिया है। इस आंदोलन के पीछे उनका हाथ होने का पहले भी मेरे रिपोर्ट में जिक्र किया गया था। राजनीतिक और प्रशासनिक पहलें:
मेयर के रूप में बलेन शाह ने काठमांडू में पारदर्शी प्रशासन और आधुनिक सुविधाओं को बढ़ावा दिया। उन्होंने नगर परिषद की बैठकों को लाइव टेलीकास्ट कराया, कचरा प्रबंधन को प्रभावी बनाया और अवैध निर्माण हटाने के लिए सख्त कदम उठाए. उनकी नीतियों से कई विवाद भी हुए, जैसे नदी किनारे अवैध कब्जों को हटाना और संघीय सरकार से टकराव। इसके बावजूद उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती रही. इसी कारण अब प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि बलेन शाह अंतरिम प्रधानमंत्री बनें और देश में स्थिरता लाएं।
क्या कहता है नेपाल का संविधान : केपी शर्मा ओली ने राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल को अपना इस्तीफ़ा सौंपते हुए कहा कि यह राजनीतिक समाधान और मौजूदा मुद्दों के समाधान के लिए है। प्रधानमंत्री ओली ने अपने इस्तीफ़े में कहा “नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 76 (2) के अनुसार, मुझे 15 जुलाई, 2024 को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया था। देश की वर्तमान असाधारण परिस्थितियों को देखते हुए और संवैधानिक राजनीतिक समाधान व समस्या-समाधान के लिए आगे के प्रयास शुरू करने के लिए मैं संविधान के अनुच्छेद 77 (1) (ए) के अनुसार आज से प्रभावी प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा देता हूं।”
क्यों दिया इस्तीफा?: नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने क्यों दिया इस्तीफा? इसके पीछे कई वजहें सामने आ रही हैं। बताया जा रहा है कि हिंसक प्रदर्शन के बाद केपी ओली पर नैतिक दबाव बढ़ गया था। इसी वजह से प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस्तीफा दे दिया है। हिंसक प्रदर्शनों में 20 से ज्यादा लोगों मौत के बाद ओली सरकार कटघरे में थी। हालात पर काबू पाने के लिए सेना को तैनात करना पड़ा। बावजूद इसके Gen-Z के हिंसक प्रदर्शन के चलते सेना प्रमुख अशोक राज सिग्देल ने केपी ओली को इस्तीफा देने की सलाह दी थी। इससे पहले गृहमंत्री रमेश लेखक और स्वास्थ्य मंत्री प्रदीप पौडेल पहले ही इस्तीफा दे चुके थे, जिसके बाद हार कर केपी ओली को भी अपना पद त्यागना पड़ा।
क्या होगा राजनीतिक विकल्प: जानकारी के अनुसार, नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने अपने पद से इस्तीफा देने के बाद देश की कमान उप-प्रधानमंत्री को सौंप दी है। हालाँकि, प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि देश में एक अंतरिम सरकार का गठन किया जाना चाहिए। इसके अलावा, संसद को भंग कर नए चुनाव कराने की भी मांग की जा रही है।
क्या कहा है नेपाल का संविधान ?:
नेपाल के संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री के अचानक इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति को लिखित रूप से सूचित किया जाना चाहिए। तो यह इस्तीफा मान्य माना जाता है। राष्ट्रपति इसे स्वीकार करते हैं और सरकार के प्रमुख के पद पर रिक्ति की घोषणा करते हैं।
राष्ट्रपति की भूमिका: राष्ट्रपति का संविधान के तहत यह दायित्व होता है कि वह नए प्रधानमंत्री के चयन की प्रक्रिया शुरू करें। राष्ट्रपति संविधान की धारा 76 के तहत नए प्रधानमंत्री के लिए संभावित उम्मीदवारों से परामर्श करते हैं।
नए प्रधानमंत्री का चयन:
यदि संसद की एक निश्चित पार्टी के पास बहुमत होता है, तो उस पार्टी के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाता है। यदि किसी पार्टी के पास बहुमत नहीं है, तो राष्ट्रपति संसद के सदस्यों के बीच से सबसे अधिक बहुमत प्राप्त उम्मीदवार को प्रधानमंत्री नियुक्त करते हैं।यदि बहुमत प्राप्त नहीं होता है, तो राष्ट्रपति संसद को भंग कर नई चुनाव कराने का आदेश दे सकते हैं।
प्रधानमंत्री पद रिक्त रहने की अवधि: प्रधानमंत्री के इस्तीफे के बाद, नया प्रधानमंत्री नियुक्त होने तक पूर्व प्रधानमंत्री या उनकी सरकार एक कार्यवाहक सरकार के रूप में काम करती है, ताकि प्रशासनिक कार्य बिना रुकावट जारी रह सकें।
सरकार का विश्वास परीक्षण: नया प्रधानमंत्री बनने के बाद संसद में विश्वास मत प्राप्त करना आवश्यक होता है। यदि विश्वास मत प्राप्त हो जाता है, तो सरकार स्थिर मानी जाती है। यदि नहीं, तो फिर से राष्ट्रपति अन्य विकल्पों की तलाश करते हैं। के पी शर्मा ओली की ये गलतियां: पिछले हफ्ते तक शांत दिख रहे एक फैसले की वजह से नेपाली युवाओं ने विद्रोह कर दिया और वहां खूनी संघर्ष शुरू हो गया. पीएम ओली को इस्तीफा देना पड़ गया. आखिर वो कौन सी गलतियां रहीं जिसकी वजह से ओली को पद छोड़ना पड़ गया। जेन जी के बैनर तले प्रदर्शनकारियों ने राजधानी काठमांडु के कई हिस्सों में प्रधानमंत्री ओली के खिलाफ लगातार जमकर नारे लगाए. कई जगहों पर आगजनी भी की गई। नेपाल के विदेश मंत्री की उनके परिवार के साथ पिटाई कर दी गई। नाराजगी इस कदर रही कि कई नेताओं और मंत्रियों के घरों में तोड़फोड़ और आगजनी की गई. भारी हिंसा के बीच गृह मंत्री रमेश लेखक ने कल ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. पीएम को इस्तीफा देने के लिए मजबूर करने वाली जेन ज़ी वे युवा हैं जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ। पार्टी और सरकार को डिक्टेटर की तरह चलाया: प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली नेपाल की राजनीति के बड़े खिलाड़ी माने जाते रहे हैं. वह चौथी बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे। नेपाल में बेरोजगारी चरम पर है और इधर देश में भ्रष्टाचार भी लगातार बढ़ता जा रहा था। ओली इसे रोक पाने में नाकाम साबित हुए. ओली मिली-जुली सरकार चला रहे थे. उनकी सरकार कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) नेपाली कांग्रेस पार्टी के समर्थन से चल रही थी। लेकिन वह मिली-जुली सरकार चलाने के बाद भी पार्टी और सरकार पर तानाशाही रवैया अपनाए हुए थे. कहा जाता है कि सरकार से जुड़े बड़े फैसले के लिए भी वह अपने सहयोगियों से ज्यादा सलाह मशविरा नहीं किया करते थे। ओली को चीन परस्त नेता माना जाता है और वो भारत से ज्यादा चीन के करीबी माने जाते हैं। उनकी कोशिश यही थी कि जिस तरह से चीन ने अपने यहां बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बैन लगा रखा है, वो भी अपने देश में यही करना चाहते थे। सोशल मीडिया पर अंकुश के जरिए लोगों की आवाज भी दबाने की कोशिश में लगे थे, लेकिन सोशल मीडिया पर बैन लगाने का उनका तानाशाही और तुगलकीभर फैसला उनके खिलाफ चला गया।ओली ने पड़ोसी देशों से खराब किए संबंध: नेपाल लैंडलॉक्ड देश है और भारत तथा चीन इसके अहम पड़ोसी देश हैं. वह भारत विरोधी रहे हैं। पिछले महीने भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी जब नेपाल के दौरे पर थे तब उन्होंने ओली को दिल्ली आने का न्योता दिया था। कहा जा रहा है कि पहले वह उन्होंने आने का प्लान बनाया था, लेकिन बाद में रद्द कर दिया गया। चौथी बार प्रधानमंत्री के रूप में ओली का कार्यकाल विवादों में रहा. भारत के साथ उनका रिश्ता कटुता भरा रहा. भारत पीएम ओली के अनावश्यक राष्ट्रवादी रवैये से नाराज था. उन्होंने लिपुलेख सीमा से जुड़े मसले पर भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने की कोशिश की थी। पिछले हफ्ते चीन के तियानजिन शहर में आयोजित की गई शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में भी पीएम ओली भी शामिल हुए थे. पहले उनकी योजना प्रधानमंत्री मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक करने की थी, लेकिन बाद में यह बैठक रद्द कर दी गई. ओली सरकार चीन के साथ मधुर रिश्ते बनाने के चक्कर में भारत से अपने संबंध लगातार बिगाड़ती चली गई. बताया जाता है कि हालात यह हो गए कि भारत ओली सरकार से नाराज चल रहा था.
अमेरिका से ले लिया सीधा पंगा: नेपाल में हिंसा और आगजनी, ओली सरकार के पतन के लिए खुद ओली सरकार ही जिम्मेदार रही. उसने अपने यहां जिन सोशल मीडिया पर बैन लगाया, वो सब की सब अमेरिका की कंपनी थीं. ये सभी बड़ी और रसूखदार कंपनियां थीं. ओली सरकार ने इस एकतरफा फैसले के जरिए अमेरिका से सीधे-सीधे पंगा ले लिया. सरकार ने सोशल मीडिया की दिग्गज कंपनियों फेसबुक, इंस्टाग्राम, वाट्सऐप, मैसेंजर, यूट्यूब, X (ट्वीटर) और स्नैपचैट पर बैन लगा दिया। ये सभी कंपनियां अमेरिका से जुड़ी थीं, जबकि नेपाल में टिकटॉक,वी चैट, वीबो और लाइकी जैसे ऐप जारी रहे जो चीन की कंपनियां हैं.ऐसे में यह दुनियाभर में यह मैसेज गया कि ओली सरकार चीन का समर्थन कर रही है जबकि वह अमेरिका के खिलाफ है. फेसबुक, इंस्टाग्राम, वाट्सऐप, मैसेंजर, यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भारत और अन्य देशों की तरह नेपाल में भी खासा लोकप्रिय है. नेपाल सरकार के फैसले के खिलाफ युवा पीढ़ी उग्र हो गई.
’जेन-जी’ से बात नहीं, गोली चलाने के आदेश
केपी शर्मा ओली भले ही चौथी बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने हों, लेकिन वह यह भांपने में चूक गए कि युवा पीढ़ी के खिलाफ फैसला उन पर ही भारी पड़ जाएगा. पिछले हफ्ते जब पीएम ओली ने सोशल मीडिया पर बैन लगाने का फैसला लिया तो उन्होंने जेन-जेड यानी युवा पीढ़ी से कोई बात ही नहीं की.
फैसले के खिलाफ जब लोग सड़क पर उतरे. काठमांडु समेत पूरे नेपाल में प्रदर्शन तेज होता चला गया तो सरकार ने प्रदर्शनकारियों के ऊपर गोली चलाने के आदेश जारी कर दिया. फायरिंग की घटना में कल सोमवार को 19 लोगों की मौत हो गई जबकि 350 से अधिक घायल हो गए. वहां पर छात्रों के नेतृत्व में हो रहे विरोध प्रदर्शन में आम लोगों का भी गुस्सा दिख रहा है. प्रदर्शनकारी कर्फ्यू और सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के बावजूद राजधानी काठमांडु और अन्य स्थानों पर जमा हुए हैं. सरकार ने अब बैन भले ही हटा दिया है, लेकिन विद्रोह की चिंगारी सुलगी हुई है. देखना है कि यह आग कितनी जल्दी बुझती है।










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