
नेपाल बोर्डर से अशोक झा: राष्ट्रपति भवन शीतल निवास में सुशीला कार्की के अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने के तुरंत बाद सुशीला कार्की से मिलने वाले सबसे पहले विदेशी कूटनीतिज्ञ भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव हैं।नेपाल की नवनियुक्त अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की से नेपाल में भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव ने मुलाकात कर उन्हें बधाई दी। साथ ही नेपाल को इस संकट की घड़ी से बाहर निकलने में हरसंभव मदद का भरोसा भी दिया। आखिर दे भी क्यों नहीं? भारत और नेपाल में दो सहोदर भ्राताओं जैसे रिश्ते रहे हैं जिनमें रोटी और बेटी तक का सम्बन्ध रहा है। भारत के स्वतन्त्र होने के बाद इन रिश्तों में और प्रगाढ़ता आयी और दुनिया के एकमात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल के साथ भारत ने अपने अटूट एतिहासिक सांस्कृतिक रिश्तों को और मजबूत किया। दोनों देशों के बीच सैनिक सम्बन्ध भी इस प्रकार के स्थापित हुए कि नेपाल की सुरक्षा की गारंटी तक भारत ने ली और नेपाली जनता के लिए भारत के द्वार हर तरफ से खोले तथा इसके विकास व प्रगति में अपना पूरा योगदान दिया। जाहिर है कि इनमें आर्थिक रिश्ते भी बहुत महत्व रखते थे, अतः भारत ने नेपाल के समग्र आर्थिक विकास में अपना पूरा योगदान दिया।
होटल उद्योग को 25 अरब रुपये का नुकसान: जेन-जी युवाओं के नेतृत्व वाले सरकार विरोधी प्रदर्शनों में नेपाल के लगभग दो दर्जन होटलों में तोड़फोड़, लूटपाट या आगजनी की घटनाएं हुई हैं। इसमें 25 अरब नेपाली रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। होटल एसोसिएशन नेपाल (एचएएन) ने कहा है कि सबसे ज्यादा प्रभावित होटलों में काठमांडू का हिल्टन होटल शामिल है। अकेले उसे ही आठ अरब रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। काठमांडू घाटी, पोखरा, बुटवल, भैरहवा, झापा, विराटनगर, धनगढ़ी, महोत्तरी और डांग-तुलसीपुर के अन्य प्रमुख घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ब्रांड होटलों को भी हिंसा का खामियाजा भुगतना पड़ा। एसोसिएशन ने सरकार से मरम्मत व पुनर्निर्माण के लिए एक आर्थिक राहत पैकेज का भी आग्रह किया है।मरने वालों की संख्या बढ़कर 51 हुई: नेपाल पुलिस ने बताया कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान मरने वालों की संख्या बढ़कर 51 हो गई है। इनमें एक 55 वर्षीय भारतीय महिला (गाजियाबाद निवासी राजेश देवी गोला) और तीन पुलिसकर्मी भी हैं। पुलिस ने कहा कि गुरुवार और शुक्रवार को देश के विभिन्न हिस्सों में 17 शव बरामद हुए हैं।
जेन-जी ने मनाया जीत का जश्न: सुशीला कार्की की नियुक्ति की खबर मिलते ही जेन-जी समूह के युवाओं ने काठमांडू के महाराजगंज स्थित शीतल निवास स्थित राष्ट्रपति कार्यालय के बाहर जीत का जश्न मनाया। इंटरनेट मीडिया ”पहली महिला प्रधानमंत्री को बधाई”, ”सफल हो, देश बचाओ और बनाओ”, ”जेन-जी का शुक्रिया, जिन्होंने इसे संभव बनाया” जैसे पोस्टों से भरा पड़ा है। एक लड़की ने अपने फेसबुक स्टेटस में पहली महिला प्रधानमंत्री की नियुक्ति पर अपनी खुशी व्यक्त करते हुए लिखा, ”हां, यह मेरा घर है, मेरा कॉलेज है, अब मेरा देश भी मां के प्यार, त्याग और स्नेह से चलेगा।” परन्तु शुरू में राजशाही में चलने वाले नेपाल में 2008 में जब राजशाही का अन्त हुआ और यहां की जनता के उग्र आन्दोलन के स्वरूप नेपाल एक गणतान्त्रिक व धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित हुआ, तो इसका संविधान बनाने में भारत ने पूर्ण सहयोग किया मगर तब तक नेपाल पर चीन का आंशिक प्रभाव भी प्रभावी होने लगा था। अतः गणतान्त्रिक नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टियों का भी प्रभाव बढ़ा। गणतान्त्रिक नेपाल में कम्युनिस्टों को फलने-फूलने का अच्छा अवसर प्राप्त हुआ मगर ये पार्टियां भारत के साथ इसके अन्तः सम्बन्धों को नहीं तोड़ पाईं। वर्तमान में नेपाल में जो जन आन्दोलन खड़ा हुआ उसे पूरी तरह जनता का स्फूर्त आन्दोलन कहना उचित नहीं होगा क्योंकि इस आन्दोलन के तहत चुन-चुन कर लोकतान्त्रिक संस्थानों पर हमला किया गया और 2015 से लागू नेपाल के संविधान की धज्जियां उड़ाई गईं। इस आन्दोलन में कहीं न कहीं चीन विरोधी शक्तियों की भूमिका भी नजर आती है। क्योंकि नेपाल से पहले बंगलादेश व श्रीलंका में भी हमें यही देखने को मिला। मगर इससे चीन को भी वैधानिकता नहीं मिल जाती है क्योंकि इसने इन तीनों ही देशों में अपना आर्थिक विस्तार करके भ्रष्टाचार को ही कहीं न कहीं बढ़ावा दिया। बंगलादेश में तो वहां की भारत की मित्र शेख हसीना सरकार को उखाड़ा गया और यही हाल श्रीलंका में भी हुआ मगर नेपाल में तो चीन ने अपनी शक्ति का विस्तार राजनीतिक स्तर पर भी बहुत तेजी के साथ किया था। वरना एक जमाने में यहां की प्रमुख राजनीतिक पार्टी नेपाली कांग्रेस ही हुआ करती थी जो राजशाही के दौरान यहां की पंचायत राज प्रणाली की कर्णधार मानी जाती थी। वर्तमान में पिछले कुछ दिनों में नेपाल में जो कुछ भी हुआ है उसे केवल भीषण अराजकता ही कहा जा सकता है जिसमें जनता ने अपने ही बनाये राष्ट्रीय संस्थानों को तहस-नहस किया। अतः भारत के बारे में भी ऐसा ही कुछ सोचने वाले लोग न केवल गलती पर हैं बल्कि राष्ट्रद्रोह की बात करते हैं क्योंकि भारत में लोकतन्त्र की जड़ें बहुत गहरी हैं जिन्हें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जमाकर गये हैं।
महात्मा गांधी ने स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान सबसे ज्यादा जोर व्यक्ति की गरिमा व उसके आत्मसम्मान पर दिया जिससे स्वतन्त्र भारत का वह स्वयं शासक एक वोट के अधिकार के माध्यम से बन सके। इसके साथ ही बापू ने सर्वाधिक जोर अहिंसा पर दिया जिससे किसी भी सूरत में स्वतन्त्र भारत में किसी भी स्तर पर अराजकता पैदा न हो सके। गांधी के देश में यह फार्मूला समय की हर कसौटी पर खरा उतरा है अतः भारत में अराजकता की बात करने वाले लोग भारतीय संविधान की उस ताकत की अनदेखी करते हैं जिसमें प्रत्येक नागरिक को एक समान अधिकार बिना किसी भेदभाव के दिये गये हैं। गांधी के आन्दोलन का प्रभाव नेपाल पर भी न पड़ा हो एेसा नहीं है। वस्तुतः नेपाली कांग्रेस गांधी के आन्दोलन की ही उपज थी जो शान्तिपूर्ण तरीकों से राजशाही के तहत जनता के अधिकारों के लिए लड़ी। वर्तमान में लगातार कई दिनों तक हिंसा करने के बाद नेपाल को क्या मिला? विध्वंस कभी भी किसी राष्ट्र का ध्येय नहीं हो सकता। विध्वंस से केवल नकारात्मकता का ही सृजन होता है जो कि व्यक्ति के विकास में सबसे बड़ी बाधा होती है अतः कुछ दिनों के विध्वंस के बाद नेपाली सेना ने स्थिति को अपने नियन्त्रण में लिया और सामान्य हालात बनाने के प्रयास किये। सवाल पूछा जा सकता है कि जब लगातार दो दिन तक नेपाल की सड़कों पर तांडव हो रहा था तो सेना क्यों चुप थी? इसका उत्तर है कि तब तक नेपाल में लोगों की चुनी हुई के.पी. शर्मा ओली की सरकार सत्ता पर काबिज थी और शासन पर उसी का नियन्त्रण था। सेना ने तभी कमान संभाली जब यह सरकार बेअसर हो गई और प्रशासन पर इसकी पकड़ समाप्त हो गई। इसका निष्कर्ष यह भी निकाला जा सकता है कि नेपाली सेना भी लोकतन्त्र का सम्मान करती है और वह समस्या का हल इसी दायरे में ढूंढना चाहती है। क्योंकि नेपाल के सेना प्रमुख ने स्वयं सत्ता संभालने की बात नहीं कही है बल्कि उन्होंने यहां के राष्ट्रपति को अपने संरक्षण में रखा हुआ है।
नेपाल और बंगलादेश की अराजकता में यही मूलभूत अन्तर है। जैसी खबरें हैं उनके अनुसार इस देश की सत्ता प्रमुख देश के सर्वोच्च न्यायालय की प्रधान न्यायाधीश रहीं श्रीमती सुशीला कार्की नई प्रधानमन्त्री को कमान सौंप दिया हैं क्योंकि उनके नाम पर आन्दोलन कारियों में भी सहमति बताई थी। जहां तक भारत का सवाल है तो इसकी मंशा नेपाल की स्थिरता के लिए ही हो सकती है क्योंकि एक स्थिर व विकसित नेपाल भारत के हित में है। भारत किसी दूसरे देश के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता है मगर वह इस बात का हिमायती रहता है कि किसी भी देश में सरकार वहां की जनता की इच्छा के अनुरूप ही बननी चाहिए। 2008 में राजशाही के विरुद्ध उपजे आन्दोलन में भी भारत का रुख यही रहा था।









Hits Today : 2965
Who's Online : 5