
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: तू ही रचयिता है इस सृष्टि का है कर्मा , सदा ही तेरी जय हो श्री भुवन विश्वकर्मा’। हिंदू धर्म में विश्वकर्मा पूजा का खास महत्व है। इस दिन लोग अपने वाहन, मशीन, औजार, कलपुर्जे, दुकान आदि की पूजा-आराधना करते हैं। इस वर्ष यह पर्व 17 सितंबर को मनाया जाएगा। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन भगवान ब्रम्हा के सातवें पुत्र भगवान विश्वकर्मा का जन्म हुआ था। विश्वकर्मा जी को सृष्टि का रचयिता और देवताओं के वास्तुकार के रूप में माना जाता है। ऐसे में लोग इस पर्व पर भगवान की पूजा-अर्चना कर उनका आर्शीवाद लेते हैं।
विश्वकर्मा पूजा हर साल बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। यह खास त्योहार सृष्टि के प्रथम शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा को समर्पित होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा ने रावण की सोने की लंका से लेकर भगवान श्रीकृष्ण की द्वारिका नगरी का निर्माण किया था। इसलिए इस दिन लोहे के औजार, मशीनें, वाहन और अन्य कार्य साधनों की पूजा करके उनकी कृपा प्राप्त करने की परंपरा है। मान्यता है कि ऐसा करने से कारोबार में बढ़ोतरी होती है और व्यवसायिक गतिविधियां सफल रहती हैं। शास्त्रों को वास्तुशिल्प की अलग-अलग विधाओं में विशेषज्ञ मानाजाता है। पौराणिक साक्ष्यों के मुताबिक स्वर्ग लोक की इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, असुर राज रावण की स्वर्णनगरी लंका, भगवान श्रीकृष्ण की समुद्र नगरी द्वारिका और पांडवों की राजधानी हस्तिनापुर के निर्माण का श्रेय भी विश्वकर्मा को ही जाता है। पौराणिक कथाओं में इन उत्कृष्ट नगरियों के निर्माण के रोचक विवरण मिलते हैं। ओडिशा का विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर तो विश्वकर्मा के शिल्प कौशल का अप्रतिम उदाहरण माना जाता है। विष्णु पुराण में उल्लेख है कि जगन्नाथ मंदिर की अनुपम शिल्प रचना से खुश होकर भगवान विष्णु ने उन्हे शिल्पावतार के रूप में सम्मानित किया था। महाभारत में पांडव जहां रहते थे उस स्थान को इंद्रप्रस्थ के नाम से जाना जाता था। इसका निर्माण भी विश्ववकर्मा ने किया था। कौरव वंश के हस्तिनापुर और भगवान कृष्ण के द्वारका का निर्माण भी विश्वणकर्मा ने ही किया था। सतयुग का स्वर्ग लोक, त्रेतायुग की लंका, द्वापर की द्वारिका और कलयुग के हस्तिनापुर आदि के रचयिता विश्वकर्मा जी की पूजा अत्यन्त शुभकारी है। सृष्टि के प्रथम सूत्रधार, शिल्पकार और विश्व के पहले तकनीकी ग्रन्थ के रचयिता भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं की रक्षा के लिये अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया था। विष्णु को चक्र, शिव के त्रिशूल, इंद्र को वज्र, हनुमान को गदा और कुबेर को पुष्पक विमान विश्वकर्मा ने ही प्रदान किये थे। सीता स्वयंवर में जिस धनुष को श्रीराम ने तोड़ा था वह भी विश्वकर्मा के हाथों बना था। जिस रथ पर निर्भर रहकर श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन संसार को भस्म करने की शक्ति रखते थे उसके निर्माता विश्वकर्मा ही थे। पार्वती के विवाह के लिए जो मण्डप और वेदी बनाई गई थी वह भी विश्वकर्मा ने ही तैयार की थी। माना जाता है कि विश्वकर्मा ने ही लंका का निर्माण किया था। इसके पीछे कहानी है कि शिव ने माता पार्वती के लिए एक महल का निर्माण करने के लिए भगवान विश्वकर्मा से कहा तो विश्वकर्मा ने सोने का महल बना दिया। इस महल के पूजन के दौरान भगवान शिव ने राजा रावण को आंमत्रित किया। रावण महल को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया और जब भगवान शिव ने उससे दक्षिणा में कुछ देने को कहा तो उसने महल ही मांग लिया। भगवान शिव उसे महल देकर वापस पर्वतों पर चले गए। विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए उड़ने वाले रथों का निर्माण किया था। विश्वकर्मा ने देवताओं के राजा इंद्र का हथियार वज्र का निर्माण किया था। वज्र को ऋषि दधीचि और अज्ञेयस्त्र की हड्डियों से बनाया गया है। भगवान विष्ण का सुदर्शन चक्र उनकी शक्तिशाली रचनाओं में से एक था।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 17 सितंबर, 2023 को प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना प्रारम्भ की थी। इसमें अपने हाथों और औजारों से काम करने वाले कारीगरों और शिल्पकारों को संपूर्ण सहायता प्रदान की जाती है। इस योजना में 18 व्यवसायों में लगे कारीगर और शिल्पकार शामिल हैं, जैसे बढ़ई, नाव निर्माता, कवचकार, लोहार, हथौड़ा और औजार बनाने वाला, ताला बनाने वाला, सुनार, कुम्हार, मूर्तिकार, पत्थर तोड़ने वाला, चर्मकार, जूते बनाने वाले, राजमिस्त्री, टोकरी,चटाई, झाड़ू बनाने वाला, बुनकर, गुड़िया और खिलौने बनाने वाला (पारंपरिक), नाई, माला बनाने वाला (मालाकार), धोबी, दर्जी और मछली पकड़ने के जाल बनाने वाले लोग शामिल हैं। पीएम विश्वकर्मा योजना में पीएम विश्वकर्मा प्रमाणपत्र और पहचान पत्र के माध्यम से मान्यता, कौशल सत्यापन के माध्यम से कौशल उन्नयन, बुनियादी कौशल, उन्नत कौशल प्रशिक्षण, उद्यमशीलता ज्ञान, 15,000 रुपये तक के टूलकिट प्रोत्साहन, तीन लाख रुपये तक की ऋण सहायता दी जाती है।








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