अशोक झा/ कोलकाता: पश्चिम बंगाल के टीएमसी नेता मुकुल रॉय को दलबदल विरोधी कानून के तहत बड़ा झटका लगा है। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने उनकी विधानसभा सदस्यता को रद्द कर दिया है। मुकुल रॉय मई 2021 में बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीतकर विधायक बने थे। मुकुल रॉय मई 2021 में भाजपा (BJP) के टिकट पर सदन के लिए चुने गए थे, लेकिन उसी साल अगस्त में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की मौजूदगी में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए।
जस्टिस देबांगसु बसाक की अध्यक्षता वाली एक खंडपीठ ने विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी और भाजपा विधायक अंबिका रॉय की याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए रॉय को राज्य विधानसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया। अधिकारी ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर विधानसभा अध्यक्ष बिमान बनर्जी के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें रॉय को दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य ठहराने की उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि भाजपा के टिकट पर चुने जाने के बाद वह सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे।अदालत ने न सिर्फ अयोग्यता का आदेश दिया, बल्कि विधानसभा के स्पीकर बिमान बनर्जी द्वारा दिए गए पूर्व निर्णय को भी खारिज कर दिया। स्पीकर ने मुकुल रॉय की अयोग्यता पर निर्णय लेने में देरी की थी, जिसे अदालत ने ‘पक्षपाती’ रवैया बताया।राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा: मुकुल रॉय का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा है। नवंबर 2017 में वे तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे। बाद में उनके बेटे शुभ्रांग्शु रॉय ने भी भाजपा का दामन थामा। पार्टी में योगदान को देखते हुए 2020 में मुकुल रॉय को भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया। 2021 के विधानसभा चुनाव में वे बिना ज़्यादा प्रचार किए ही कृष्णानगर उत्तर से बड़े अंतर से जीते, लेकिन चुनावों के बाद अचानक फिर से तृणमूल कांग्रेस में लौट आए।सुवेंदु अधिकारी ने तीखी प्रतिक्रिया दी: हाईकोर्ट के फैसले के बाद विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, ऐतिहासिक फैसला है। यह वही याचिका है जो मैंने विपक्ष के नेता की हैसियत से दायर की थी। माननीय अदालत ने मुकुल रॉय को अयोग्य ठहराते हुए स्पीकर द्वारा दिए गए पक्षपाती आदेश को भी रद्द कर दिया है। भले ही देर लगे, लेकिन सत्य की ही जीत होती है। संविधान और दसवीं अनुसूची की मर्यादा को बचाते हुए अदालत ने दल-बदल मामलों में स्पीकर की पक्षधरता को स्पष्ट कर दिया है। मैं इस ऐतिहासिक फैसले का स्वागत करता हूं।यह फैसला बंगाल की राजनीति में हलचल मचाने वाला माना जा रहा है और आने वाले दिनों में इसके व्यापक राजनीतिक प्रभाव देखे जा सकते हैं।










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