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    Home » जहां हमारी संख्या ज्यादा, वहां हमारी मर्जी चलेगी : हिमायूं कबीर

    जहां हमारी संख्या ज्यादा, वहां हमारी मर्जी चलेगी : हिमायूं कबीर

    Roaming ExpressBy Roaming ExpressDecember 28, 2025 बंगाल

     

    कहा, हर हालमे ममता बनेगी पूर्व मुख्यमंत्री बनकर रहेगा बाबरी मस्जिद

    अशोक झा/सिलीगुड़ी: कबीर ने जो तर्क दिए, वे बेहद चिंताजनक और भड़काऊ माने जा रहे हैं। उन्होंने साफ शब्दों में अयोध्या और मुर्शिदाबाद की तुलना ‘मुस्लिम आबादी’ के प्रतिशत के आधार पर की। उनका कहना है कि अयोध्या में मुस्लिम कम थे, इसलिए वहां बाबरी मस्जिद नहीं बन पाई, लेकिन मुर्शिदाबाद में मुस्लिम 72 फीसदी हैं, इसलिए यहां बाबरी मस्जिद जरूर बनेगी और कोई इसे रोक नहीं पाएगा। यह एक खतरनाक नैरेटिव सेट करने की कोशिश है… ‘जहां हमारी संख्या ज्यादा, वहां हमारी मर्जी चलेगी।
    हुमायूं कबीर का यह बयान 1992 की बाबरी विध्वंस और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले को एक अलग ही चश्मे से देखता है. कबीर कहते हैं, सुप्रीम कोर्ट ने 5 एकड़ जमीन दी थी, लेकिन वहां मुस्लिम आबादी कम है, इसलिए मस्जिद नहीं बन पाई।बंगाल में मुस्लिम आबादी 37 फीसदी है और मुर्शिदाबाद जिले में यह 72 फीसदी है. तो अगर यहां बाबरी मस्जिद बन रही है, तो मुझे समझ नहीं आता कि समस्या क्या है?
    विश्लेषकों का मानना है कि कबीर का यह तर्क बेहद खतरनाक है. वे कानून या संविधान की बात नहीं कर रहे, बल्कि वे यह संदेश दे रहे हैं कि किसी भी धार्मिक ढांचे या विचारधारा का अस्तित्व वहां की स्थानीय आबादी के धर्म पर निर्भर करता है. यह तर्क भारत की धर्मनिरपेक्षता की मूल भावना के खिलाफ है, जो कहता है कि कानून हर जगह बराबर है, चाहे वहां किसी भी धर्म के लोग रहते हों।’मेरे घर में बच्चा पैदा हुआ, नाम मैं रखूंगा’: जब उनसे पूछा गया कि लोग इसका विरोध क्यों कर रहे हैं, तो कबीर ने एक घरेलू उदाहरण देकर अपने इरादे साफ कर दिए. उन्होंने कहा, मेरे घर में अगर कोई बच्चा पैदा होता है, तो उसका नाम क्या होगा, यह मैं तय करूंगा। उसी तरह, मैं एक मस्जिद बना रहा हूं और मैंने उसका नाम बाबरी मस्जिद तय किया है. दूसरों को इससे क्यों दिक्कत हो रही है? उन्होंने कहा, मेरा हक है मस्जिद बनाने का और उसे नाम देने का. सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि भारत में कहीं और बाबरी मस्जिद नहीं बन सकती. यह बयान केवल एक इमारत बनाने तक सीमित नहीं है। ‘बाबरी’ नाम का चुनाव जानबूझकर किया गया है ताकि एक विशेष समुदाय की भावनाओं को उकसाया जा सके और राजनीतिक लाभ उठाया जा सके।
    “कोई उकसाएगा तो जवाब देंगे”: हुमायूं कबीर ने धमकी भरे लहजे में यह भी कहा कि अगर कोई उनके “विजन” में बाधा डालने की कोशिश करेगा, तो वे चुप नहीं बैठेंगे।उन्‍होंने कहा, कुछ लोग मुसीबत खड़ी करने की कोशिश कर रहे हैं… अगर कोई उकसाने की कोशिश करेगा, तो मैं भी उसी हिसाब से जवाब दूंगा. इसलिए किसी को भी मुसीबत खड़ी करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. और किसी को भी किसी तरह से डरना नहीं चाहिए. और मैं डरने वाला नहीं हूं।
    मुस्लिम वोट बैंक की नई गोलबंदी: हुमायूं कबीर सिर्फ धार्मिक भावनाओं को हवा नहीं दे रहे, बल्कि इसके पीछे एक ठोस राजनीतिक रणनीति भी है। उनकी नजर आगामी बंगाल विधानसभा चुनावों पर है। उन्होंने साफ कर दिया है कि वे असदुद्दीन ओवैसी और नौशाद सिद्दीकी (ISF) के साथ गठबंधन करना चाहते हैं।
    कबीर का गणित साफ है… मुर्शिदाबाद: 22 में से 17 सीटें जीतने का दावा।मालदा और दिनाजपुर: यहां भी मुस्लिम बहुल सीटों पर नजर। ओवैसी और सिद्दीकी को साथ लेकर ‘मुस्लिम अधिकारों’ के नाम पर वोट मांगना। कबीर ने ममता बनर्जी और वाम दलों दोनों पर हमला बोला. उन्होंने कहा, वाम मोर्चा ने 34 साल और ममता बनर्जी ने 14 साल तक मुसलमानों को धोखा दिया. अब मुसलमानों के जवाब देने का वक्त आ गया है. मुसलमानों को किसी का गुलाम नहीं होना चाहिए, सिर्फ अल्लाह का गुलाम होना चाहिए।
    खतरा क्या है?हुमायूं कबीर का यह पूरा अभियान अयोध्या vs मुर्शिदाबाद का नैरेटिव, 72% आबादी का दम भरना, और ‘गुलामी’ से आजादी की बात करना, बंगाल की राजनीति को एक खतरनाक मोड़ पर ले जा रहा है. यह बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच खाई को और चौड़ा करेगा. आबादी के प्रतिशत को ताकत के रूप में पेश करना, लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा है. “मैं जवाब दूंगा” जैसी भाषा प्रशासन और कानून के शासन को सीधी चुनौती है.
    बाबरी मस्जिद के बहाने हुमायूं कबीर जो समझा रहे हैं, वह सिर्फ एक इमारत की बात नहीं है. यह एक विचारधारा का प्रदर्शन है जो मानता है कि ‘संख्याबल ही शक्ति है’ और जहां संख्या है, वहां संविधान से ऊपर अपनी मर्जी चलाई जा सकती है. बंगाल के लिए आने वाले दिन सियासी तौर पर बेहद उथल-पुथल भरे हो सकते हैं।बंगाल में अगले साल विधानसभा चुनाव प्रस्तावित है, लेकिन अभी से ही राज्य इलेक्शन मोड में चला गया है. तृणमूल कांग्रेस के विरोध के बावजूद पार्टी के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद का शिलान्यास कर अपनी ताकत दिखा दी।इस मंच से हुमायूं कबीर ने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चैलेंज भी किया और दावा किया है कि उन्हें अगले चुनाव में वह उन्हें भूतपूर्व मुख्यमंत्री बनाकर दम लेंगे।हुमायूं कबीर पिछले 10 सालों में दो बार एक ही पार्टी से सस्पेंड हुए, लेकिन बागी हुमायूं कबीर का कहना है कि वह विधानसभा चुनाव में इंच-इंच हक छीनकर लेंगे. बंगाल के मुस्लिम बहुल जिला मुर्शिदाबाद में 6 दिसंबर को अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद गिराए जाने के दिन मुस्लिम विधायक हुमायूं कबीर ने बेलडांगा में बाबरी मस्जिद की नींव रखी और मस्जिद की नींव रखने के बाद उन्होंने कहा कि उनका टारगेट 90 सीटें हैं। क्या केवल यह एक तृणमूल कांग्रेस के बागी विधायक का दावा है या फिर वह बंगाल की पॉलिटिक्स बदल देंगे? पिछले 14 सालों से ममता बनर्जी का साथ देने वाले मुस्लिम क्या ममता का साध छोड़ देंगे और हुमायूं कबीर का समर्थन करेंगे? यह बड़ा सवाल है. इसके साथ ही सवाल है कि क्या हुमायूं कबीर ममता बनर्जी के मुस्लिम वोट में सेंधमारी कर पाएंगे? आइए समझें बंगाल के मुस्लिम सियासत के समीकरण क्या है। 2011 से ममता के साथ खड़े हैं मुस्लिम: सरकारी आंकड़ों के अनुसार अभी राज्य में 27 परसेंट या उससे थोड़े ज्यादा माइनॉरिटी वोटर हैं, लेकिन निजी आंकड़ों के अनुसार इनकी संख्या करीब 32 फीसदी है. वाममोर्चा के शासन में मुस्लिम एकजुट होकर लेफ्ट का समर्थन करते थे और यही वजह थी कि लेफ्ट बंगाल में 34 सालों तक सत्ता में रहा, लेकिन साल 2011 में राज्य की सियासत बदली और राज्य में बदलाव के दौरान वोटिंग पैटर्न बदल गया. माइनॉरिटी का लगभग सारा सपोर्ट तृणमूल को चला गया. तब से यह सपोर्ट धीरे-धीरे बढ़ा है. साल 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने ममता बनर्जी को कड़ी चनौती दी, लेकिन मुस्लिम वोट पूरी तरह से ममता बनर्जी के साथ खड़ा रहा है.
    2021 के विधानसभा चुनाव के अनुसार राज्य की 294 असेंबली सीटों में से 74 सीटों पर माइनॉरिटी वोटर 40 परसेंट या उससे ज्यादा हैं. तृणमूल काग्रेस ने 74 सीटों में से 69 सीटों पर जीत हासिल की. राज्य की 294 सीटों में से 57 सीटों पर माइनॉरिटी वोटर 35 से 40 परसेंट के बीच हैं. तृणमूल ने वहां 46 सीटें जीतीं.
    बागी हुए हुमायूं, ममता को दी चुनौती
    बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने दावा किया है कि, हम (हिंदू) 39 परसेंट हैं और 5-6 परसेंट हिंदू एकजुट होने पर ही सत्ता में आना मुमकिन है. इस बार हुमायूं करीब 90 सीटों पर टारगेट कर रहे हैं. वह 22 दिसंबर को नई पार्टी बनाने का ऐलान करने वाले हैं. उनकी पार्टी कुल 135 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी.
    तृणमूल कांग्रेस पिछले कुछ महीनों में बागी हुमायूं कबीर को काबू में नहीं कर पाई है. बार-बार कारण बताओ नोटिस जारी किए गए. डिसिप्लिन कमेटी की मीटिंग हुई, लेकिन हुमायूं कबीर को कोई शांत नहीं कर पाया. पार्टी ने उन्हें निलंबित कर दिया है. इससे वह और ज्यादा मुखर हो गये हैं. उन्होंने साफ कर दिया है कि वह बाबरी मस्जिद बनाने के फेसले पर अड़े हैं. राज्यपाल ने गिरफ्तारी की बात कही. खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी बिना नाम लिए तंज कसा है. हुमायूं कबीर का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि उनके पीछे बीजेपी का हाथ है.
    आखिरकार, तीन बार चेतावनी देने के बाद, तृणमूल कांग्रेस ने हुमायूं कबीर को सस्पेंड कर दिया है. कोलकाता के मेयर और टीएमसी के बड़े नेता फिरहाद हकीम ने बाबरी मस्जिद के शिलान्यास को लेकर कहा, “न तो मैं और न ही मेरी पार्टी में कोई ऐसे फैसले का सपोर्ट करता है. हमारी पार्टी सेक्युलरिज्म में विश्वास करती है. किसी को धक्का देकर पॉलिटिक्स करना हमारी पार्टी का काम नहीं है. हम ऐसे फैसले या जिस तरह के बयान दिए जा रहे हैं, उनका सपोर्ट नहीं करते.”
    क्या मुस्लिम वोटबैंक में सेंध लगा पाएंगे हुमायूं?
    हालांकि, विपक्ष इस सस्पेंशन को लोगों का दिखावा बताते हुए तृणमूल कांग्रेस पर हमला कर रहा है. बंगाल बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार का कहना है कि यह ममता बनर्जी का गैलरी शो है. प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने भी इस पर तंज कसा है. हुमायूं ने साफ कर दिया है कि उसका मकसद माइनॉरिटी वोट जीतना है. उन्होंने कोलकाता में सामूहिक गीता पाठ के खिलाफ मुर्शिदाबाद में एक लाख लोगों से कुरान पाठ कराने का ऐलान किया है. उन्होंने साफ कहा है कि उनके टारगेट मुस्लिम हैं.
    मुर्शिदाबाद बंगाल के उन जिलों में सबसे आगे है, जहां मुस्लिम वोट सबसे अधिक है. 2011 की जनगणना के अनुसार मुर्शिदाबाद में करीब 66 परसेंट माइनॉरिटी हैं. मालदा में 52 परसेंट, नादिया और नॉर्थ 24 परगना में 26 परसेंट मुस्लिम हैं.
    मुस्लिम वोटबैंक की बात करने वाली बंगाल की अन्य पार्टी ISF पिछले असेंबली इलेक्शन चुनाव मैदान में हैं, जिस तरह से औवैसी की पार्टी AIMIM ने 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले अचानक एक्टिव होने की कोशिश की थी. देखते हैं कि अगर हुमायूं की पार्टी मैदान में उतरती है तो तस्वीर कैसी होगी?

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