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    Home » राष्ट्रीय सहारा’अखबार का बंद होना दुखद ,तीन दशकों तक हिंदी पत्रकारिता की आवाज़ रहा अख़बार हो गया खामोश

    राष्ट्रीय सहारा’अखबार का बंद होना दुखद ,तीन दशकों तक हिंदी पत्रकारिता की आवाज़ रहा अख़बार हो गया खामोश

    Roaming ExpressBy Roaming ExpressJanuary 10, 2026 उत्तर प्रदेश
    -बिना नोटिस बंद हुआ अख़बार, सैकड़ों पत्रकार बेरोज़गार और बकाया वेतन के संकट में
    – अपर श्रमायुक्त ने वरिष्ठ अधिकारियों को 12 जनवरी को किया तलब

    हिंदी पत्रकारिता जगत से एक बेहद पीड़ादायक और मन को झकझोर देने वाली खबर सामने आई है। वर्ष 1991 में शुरू हुआ प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक “राष्ट्रीय सहारा” अब इतिहास के पन्नों में सिमट गया है। 8 जनवरी 2026 से अख़बार का प्रकाशन पूरी तरह बंद कर दिया गया है। दिल्ली संस्करण पहले ही दो माह पूर्व बंद हो चुका था, जबकि अब लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, गोरखपुर, देहरादून, पटना समेत देशभर के सभी संस्करणों का प्रकाशन “अगले आदेश तक” स्थगित कर दिया गया है। बताया जा रहा है कि 8 जनवरी 2026 से बिना किसी पूर्व सूचना के प्रबंधन ने अचानक अख़बार छापना बंद कर दिया। इस अप्रत्याशित फैसले ने सैकड़ों पत्रकारों, कर्मचारियों और उनके परिवारों को गहरे संकट और अनिश्चित भविष्य के अंधेरे में धकेल दिया है।

    बिना वेतन, बिना सुरक्षा

    राष्ट्रीय सहारा से जुड़े कर्मचारियों का दर्द सिर्फ नौकरी छिनने तक सीमित नहीं है। उनका आरोप है कि लंबे समय से वेतन, पीएफ, ईएसआई और ग्रेच्युटी जैसे वैधानिक बकायों का भुगतान नहीं किया गया। विडंबना यह है कि आयकर विभाग को दिए गए फॉर्म-16 में वेतन भुगतान दर्शाया गया, जबकि वास्तविकता में कर्मचारियों को पैसा नहीं मिला। अचानक प्रकाशन बंद होने से सैकड़ों घरों संकट खड़ा हो गया है।

    बिना नोटिस, बिना संवाद

    कर्मचारियों का कहना है कि न तो कोई लिखित नोटिस दिया गया और न ही किसी तरह की आधिकारिक सूचना। कई जगहों पर सिर्फ फोन कर यह कह दिया गया कि कार्यालय न आएं। कुछ यूनिटों में कर्मचारियों पर इस्तीफा देने का दबाव भी बनाया गया। यह रवैया कर्मचारियों के लिए सिर्फ अन्याय नहीं, बल्कि वर्षों की निष्ठा और समर्पण का अपमान भी माना जा रहा है।

    श्रम विभाग में पहुंचा मामला

    कई यूनिटों के पत्रकारों और कर्मचारियों ने श्रम विभाग में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। मामले को गंभीरता से लेते हुए अपर श्रमायुक्त कार्यालय ने 12 जनवरी 2026, दोपहर 3 बजे सुनवाई की तिथि तय की है। इस संबंध में सहारा इंडिया मीडिया के वरिष्ठ अधिकारियों—सीईओ सुमित राय, यूनिट हेड अजीत बाजपेयी और प्रशासनिक हेड —सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर पेश होने के निर्देश दिए गए हैं।

    1991 से 2026: एक युग का अंत करीब 34–35 वर्षों तक राष्ट्रीय सहारा ने हिंदी पत्रकारिता में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखी। सामाजिक सरोकार, ग्रामीण भारत, आम आदमी की पीड़ा और सत्ता से सवाल पूछने वाली पत्रकारिता इसकी पहचान रही। इसके बंद होने को मीडिया जगत में एक युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है। डि डिजिटल  राष्ट्रीय सहारा की वेबसाइट और ई-पेपर अभी सीमित रूप में दिखाई दे रहे हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म को भविष्य में जारी रखा जाएगा या नहीं। 00000000000000000000000000000

    पत्रकारिता जगत में शोक

    उत्तर प्रदेश एसोसिएशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (उपज) के प्रदेश सचिव एवं वरिष्ठ पत्रकार जयंत मिश्रा ने राष्ट्रीय सहारा के बंद होने पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि यह घटना मीडिया जगत के लिए बेहद चिंताजनक है। उनके अनुसार राष्ट्रीय सहारा का बंद होना केवल एक समाचार पत्र का बंद होना नहीं है, बल्कि यह हिंदी पत्रकारिता की लगातार कमजोर होती आर्थिक, संस्थागत और नैतिक स्थिति को उजागर करता है। यह अख़बार दशकों तक आम आदमी की आवाज़, ग्रामीण भारत की पीड़ा और सामाजिक सरोकारों का सशक्त मंच रहा। कहा कि राष्ट्रीय सहारा को जिंदा रखने में सैकड़ों पत्रकारों, कर्मचारियों और तकनीकी कर्मियों ने अपना जीवन समर्पित कर दिया। आज उनका अचानक बेरोज़गार हो जाना न सिर्फ अमानवीय है, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए भी खतरे की घंटी है। उन्होंने सरकार और प्रबंधन से अपील की कि कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा की जाए और पत्रकारिता को बचाने के लिए ठोस नीति बनाई जाए।
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    अब सबकी निगाहें श्रम विभाग और कानूनी प्रक्रिया पर टिकी हैं इस उम्मीद के साथ कि कर्मचारियों को उनका हक़, उनका सम्मान और उनका भविष्य वापस मिल सके।

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