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    Home » बंगाल हर दिन बढ़ता जा रहा राष्ट्रपति शासन की ओर

    बंगाल हर दिन बढ़ता जा रहा राष्ट्रपति शासन की ओर

    Roaming ExpressBy Roaming ExpressJanuary 12, 2026 बंगाल

    अशोक झा/ कोलकाता: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का समय ज्यों-ज्यों करीब आ रहा है, राजनीतिक उथल-पुथल की स्थिति गंभार होती जा रही है। इसके मुख्य केंद्रबिंदु बनते जा रहे है भाजपा और सत्ताधारी टीएमसी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का टकराव केंद्र सरकार के साथ लगातार बढ़ता जा रहा है। अब तो यह भी सवाल उठने लगा है कि क्या राज्य राष्ट्रपति शासन की दिशा में बढ़ रहा है? यह सवाल इसलिए प्रासंगिक है कि हाल के वर्षों में ममता बनर्जी की सरकार ने केंद्रीय एजेंसियों, राज्यपाल और संघीय ढांचे से जुड़े मुद्दों पर बार-बार चुनौतियां खड़ी की हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों के काम में ममता बनर्जी के सीधे हस्तक्षेप, राज्यपाल से टकराव और टीएमसी नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप इन टकरावों के मुख्य कारण हैं। केंद्रीय एजेंसियों से ममता बनर्जी की लड़ाई: ममता बनर्जी लंबे समय से केंद्रीय एजेंसियों- ईडी, सीबीआई और अन्य को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाती रही है। टीएमसी का दावा है कि ये एजेंसियां भाजपा सरकार के इशारे पर काम कर रही है. खासकर चुनावों से पहले. उदाहरण के लिए हाल ही में ईडी की छापेमारी के दौरान ममता बनर्जी की गतिविधि को लिया जा सकता है. कोयला चोरी के आरोप में प्रतीक जैन की कंपनी आई-पैक के दफ्तर और उनके अन्य ठिकानों पर ईडी ने छापे मारे तो ममता बनर्जी ने केंद्रीय एजेंसी की जांच-पड़ताल में व्यवधान उत्पन्न किया. आरोप तो यह भी है कि वे वहां से ईडी टीम की मौजूदगी में कई फाइलें जबरन अपने साथ ले गईं। ईडी की छापेमारी को राजनीतिक रंजिश का कदम बताते हुए न सिर्फ सड़क पर उतरकर विरोध किया, बल्कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर भी गंभीर आरोप लगाए. ममता के भतीजे और टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी कहा कि एजेंसियां हथियारबंद हैं और इनके सहारे भाजपा चुनाव में हेरफेर का प्रयास कर रही हैं।
    केंद्रीय एजेंसियों से ममता की पुरानी रंजिश:
    केंद्रीय एजेंसियों से ममता बनर्जी की रंजिश नई नहीं है। 2021 के विधानसभा चुनाव के पहले से ही यह शुरू हो गई थी. ईडी ने तब टीएमसी नेताओं पर मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लगाए थे. केंद्रीय एजेंसियों से ममता की लड़ाई संघीय ढांचे को प्रभावित कर रही है. ममता बनर्जी ने कई बार कहा कि केंद्र की शह पर राज्य की स्वायत्तता में सेंट्रल एजेंसियां हस्तक्षेप कर रही हैं. 2025-26 में हुई ईडी की छापेमारी के बाद टीएमसी ने आरोप लगाया कि यह राजनीतिक प्रतिशोध है. भाजपा ने भी पलटवार कर कहा कि ममता भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए एजेंसियों पर हमले कर रही हैं. इस लड़ाई ने राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति को जटिल बना दिया है, क्योंकि राज्य पुलिस और केंद्रीय एजेंसियां आमने-सामने हो गई हैं. केंद्र से ममता के टकराव को देखते हुए कयास लगाए जा रहे हैं कि अनुच्छेद 355 के तहत केंद्र सरकार राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा सकती है. अगर ऐसा होता है तो 1968 और 1970 के बाद 2026 तीसरा मौका होगा, जब बंगाल को राष्ट्रपति शासन झेलना पड़े. हालांकि पहले की परिस्थितियां दूसरी थी. तब राजनीतिक अस्थिरता के कारण राष्ट्रपति शासन की नौबत आई थी.
    केंद्र के हर कदम पर ममता को एतराज
    ममता को केंद्र के हर फैसले में खामी नजर आती है. केंद्रीय एजेंसियों का बंगाल में सीधे हस्तक्षेप से रोकने के लिए ममता ने दूसरे विपक्षी दलों के साथ सुप्रीम कोर्ट का भी रुख किया था. हालांकि उन्हें सर्वोच्च अदालत से राहत नहीं मिली थी. केंद्रीय एजेंसियों से ममता की लगातार लड़ाई राज्य को अस्थिरता की ओर धकेल सकती है. ममता बनर्जी जिस तरह केंद्र को चुनौती देती रही हैं, उससे संघीय ढांचे पर चोट पहुंचती है. वे अक्सर कहती हैं कि केंद्र सरकार राज्यों के अधिकारों का हनन कर रही है. जीएसटी, एनआरसी और सीएए जैसे मुद्दों पर उन्होंने केंद्र का विरोध किया.
    पश्चिम बंगाल में केंद्रीय योजनाओं के कार्यान्वयन में देरी या विरोध ने संघीय तनाव बढ़ाया है. टीएमसी ने विधानसभा में केंद्रीय एजेंसियों के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया, जिसमें उन्हें राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित बताया गया. यह चुनौती सिर्फ राजनीतिक नहीं, संवैधानिक भी है.
    राज्यपाल से भी टकराती रही हैं ममता
    ममता बनर्जी का राज्यपालों से भी टकराव होता रहा है. जगदीप धनखड़ से शुरू हुआ टकराव मौजूदा राज्यपाल सीवी आनंद बोस तक जारी है. ममता तो सीधा आरोप लगाती हैं कि राज्यपाल केंद्र का एजेंट के रूप में काम कररते हैं. यह सीधे-सीधे संघीय सिद्धांतों के खिलाफ है. ममता उल्टे आरोप लगाती हैं कि केंद्र सरकार संघीय ढांचे पर हमला करती हैं. इस साल जब ईडी ने टीएमसी नेताओं के घरों पर छापे मारे तो ममता ने इसे संघीय ढांचे पर हमला बताया था. भाजपा आरोप लगाती है कि ममता की सरकार भ्रष्टाचार और हिंसा को बढ़ावा देती है. वे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा कर रही हैं.
    ममता ने SIR और NRC का विरोध करते हुए स्पष्ट तौर पर कहा है कि बंगाल में कोई घुसपैठिया नहीं है. वह उनके ही बयानों का खंडन है. 2005 में ममता ने लोकसभा में सबूतों के साथ कहा था कि बांग्लादेश से आए लोगों के वोटर कार्ड बंगाल में भी बने हैं. पर, अब वे इसका खंडन करती हैं. उन्होंने तो SIR का भी खुल कर विरोध किया. वक्फ कानून लागू न करने की धमकी दी. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का कहना है कि बंगाल में भ्रष्टाचार, डर और घुसपैठ व्याप्त है. अगर केंद्र मानता है कि राज्य सरकार संविधान का पालन नहीं कर रही, तो अनुच्छेद 356 लागू हो सकता है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (एसआर बोम्मई केस) के अनुसार राष्ट्रपति शासन अंतिम विकल्प है. पर, ममता की केंद्र सरकार को लगातार चुनौतियां राज्य को उसी दिशा में ले जा सकती हैं.
    अदालती फैसले पर टिकी है सबकी नजर
    ईडी के काम में दखलंदाजी से नई मुसीबत खड़ी हुई है. ममता बनर्जी और आई-पैकके मालिक प्रतीक जैन की ओर से थानों में मामले दर्ज कराए गए हैं, जिसमें ईडी पर चोरी के आरोप हैं. राज्य सरकार और ईडी की ओर से यह मामला कलकत्ता हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है. ईडी तत्काल सुनवाई की मांग कर रही है. मामले की कलकत्ता हाईकोर्ट में शुक्रवार को सुनवाई होनी थी. कोर्ट रूम में अधिक भीड़ जुट जाने के कारण अब 14 जनवरी को सुनवाई की तारीख तय हुई है. अगर अदालत में ईडी के काम में दखलंदाजी की बात साबित हो जाती है तो यह ममता सरकार के लिए मुश्किल पैदा कर सकती है.
    राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने इसे संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन बताया है. उन्होंने यह भी कहा है कि वे चुप नहीं बैठ सकते. राज्यपाल केंद्र का प्रतिनिधि होता है और उनकी रिपोर्ट राष्ट्रपति शासन का आधार बन सकती है. अगर राज्यपाल रिपोर्ट करता है कि राज्य में संवैधानिक मशीनरी फेल हो गई है तो केंद्र कार्रवाई कर सकता है. ऐसा हुआ तो राज्य में राष्ट्रपति शासन की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. राज्य में अप्रैल में विधानसबा का चुनाव होना है. कहीं ऐसा न हो कि चुनाव राष्ट्रपति शासन में कराने की नौबत न आ जाए।

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