– आज शैलपुत्री की पूजा अर्चना के साथ हिंदुओं का नववर्ष होगा शुरू
अशोक झा/ कोलकाता: आज चैत्र अमावस्या का स्नान और दान है. 06:52 सुबह के बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि प्रारंभ हो रही है, इसके साथ ही चैत्र नवरात्रि और हिन्दू नववर्ष का शुभारंभ है।
इस बार चैत्र नवरात्र गुरुवार, 19 मार्च से प्रारंभ हो रहे हैं। नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना का विशेष महत्व होता है, जिसमें कलश स्थापित कर भगवती की पूजा की जाती है।
चैत्र नवरात्र में भक्त नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा करते हैं। घटस्थापना के साथ जौ बोने की परंपरा भी है, जिसे ज्वारा कहा जाता है। यह पर्व राम नवमी के साथ समाप्त होगा, जब मां दुर्गा की विजय का उत्सव मनाया जाता है।
पंचांग के अनुसार, घटस्थापना के लिए शुभ मुहूर्त गुरुवार की सुबह 6 बजकर 52 मिनट से सुबह 7 बजकर 43 मिनट तक यानी कुल 50 मिनट तक है। वहीं, अभिजित मुहूर्त में घटस्थापना दोपहर 12 बजकर 5 मिनट से दोपहर 12 बजकर 53 मिनट तक है। यह समय अत्यंत शुभ माना जाता है। यदि मुख्य मुहूर्त में संभव न हो तो अभिजित मुहूर्त का लाभ उठाया जा सकता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, घटस्थापना का कार्य सूर्योदय के बाद और उचित मुहूर्त में करना चाहिए।
19 मार्च को सूर्योदय सुबह 6 बजकर 26 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 6 बजकर 32 मिनट पर होगा। अमावस्या तिथि सुबह 6 बजकर 52 मिनट तक रहेगी, इसके बाद प्रतिपदा शुरू होगी जो अगले दिन सुबह 4 बजकर 52 मिनट तक चलेगी। नक्षत्र उत्तर भाद्रपद है, जो अगले दिन सुबह 4 बजकर 5 मिनट तक रहेगा, फिर रेवती शुरू होगा।
गुरुवार के शुभ मुहूर्त की बात करें तो ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 51 मिनट से 5 बजकर 39 मिनट तक विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 30 मिनट से 3 बजकर 18 मिनट तक, गोधूलि मुहूर्त शाम 6 बजकर 29 मिनट से 6 बजकर 53 मिनट तक है। अमृतकाल रात 11 बजकर 32 मिनट से देर रात 1 बजकर 3 मिनट रहेगा।
नवरात्र के पहले दिन अशुभ समय की बात करें तो राहुकाल दोपहर 2 बजे से 3 बजकर 30 मिनट तक, यमगंड सुबह 6 बजकर 26 मिनट से 7 बजकर 57 मिनट तक है। गुलिक काल सुबह 9 बजकर 28 मिनट से 10 बजकर 58 मिनट तक और दुर्मुहूर्त सुबह 10 बजकर 28 मिनट से 11 बजकर 17 मिनट है।नवरात्रि के हर दिन मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है, जिसमें पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित होता है।
मां शैलपुत्री, मां दुर्गा का पहला स्वरूप हैं, जो प्रकृति की शक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं। उनकी पूजा करने से आत्मा की शुद्धि होती है और व्यक्ति को स्थिरता व आंतरिक शक्ति मिलती है।
मां शैलपुत्री कौन हैं?
मां शैलपुत्री को हिमालय की पुत्री माना जाता है। उनका नाम संस्कृत शब्द “शैल” से बना है, जिसका अर्थ पर्वत होता है। इसलिए उन्हें पर्वतराज की बेटी यानी शैलपुत्री कहा जाता है। उन्हें प्रकृति का रूप भी माना जाता है और उनके अंदर ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों की शक्तियां विद्यमान हैं।
नवरात्रि के पहले दिन भक्त व्रत की शुरुआत करते हैं और आत्मशुद्धि पर ध्यान देते हैं। वे मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना करते हैं और उनसे आध्यात्मिक ज्ञान, आंतरिक शक्ति और जीवन में स्थिरता की कामना करते हैं। यह दिन मूलाधार चक्र से भी जुड़ा माना जाता है, जो आध्यात्मिक ऊर्जा का आधार होता है।
मां शैलपुत्री व्रत कथा (Maa Shailputri Vrat Katha)
मां शैलपुत्री, देवी दुर्गा का पहला स्वरूप मानी जाती हैं और उनकी कथा बहुत प्रेरणादायक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार राजा दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया था, लेकिन उनके मन में अपने दामाद भगवान शिव के प्रति नाराजगी थी, इसलिए उन्होंने उन्हें आमंत्रित नहीं किया।
जब यह बात माता पार्वती (सती) को पता चली, तो वे अपने पिता के यज्ञ में जाना चाहती थीं। शिवजी के समझाने के बावजूद वे अकेले ही वहां पहुंच गईं। यज्ञ में उन्होंने अपने पति का अपमान होते देखा, जिससे उन्हें गहरा दुख हुआ और उन्होंने वहीं अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए।
इस घटना से क्रोधित होकर शिवजी ने यज्ञ को नष्ट कर दिया और सती के शरीर को लेकर घूमने लगे। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए, जो आगे चलकर शक्तिपीठ कहलाए। बाद में सती ने हिमालय के घर पुनर्जन्म लिया और मां शैलपुत्री के रूप में जानी गईं।







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