
– जिनके मन में श्रीराम , भाग्य में उसके वैकुण्ठ धाम
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: राम नवमी भारत में मनाया जाने वाला एक विशेष पर्व है। यह भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव का पावन दिन है।कही आज तो कही कल रामनवमी की भव्य और दिव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी। यह अधर्म पर धर्म की विजय और मर्यादा पुरुषोत्तम के आदर्शों को याद करने का अवसर है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और श्रीराम की भक्ति करने से जीवन के सभी दुख दूर होते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। भारतीय संस्कृति में राम का महत्व सदियों-सदियों से विद्यमान है। राम को धर्म, जाति, देश और काल तक सीमित नहीं किया जा सकता। राम दुनिया की महाशक्ति हैं। जीवन की प्रत्येक समस्या के निवारण का रहस्य राम नाम में निहित है। यानी जो कण-कण में बसे, वही राम हैं। भारतीय संस्कृति राम के बिना अधूरी है। भगवान राम हमारी विराट भारतीय संस्कृति के केवल आदर्श नहीं, बल्कि राम संस्कृति ही भारतीय संस्कृति, मानवीय संस्कृति और विश्व संस्कृति है। राम का आदर्श जीवन हमारी भारतीय संस्कृति का ऐसा दिव्य प्रभामंडल है, जो समस्त राष्ट्र और विश्व को आलोकित करता रहेगा। दरअसल, देखा जाए तो राम मात्र भारतीय संस्कृति के प्राण पुरुष नहीं, बल्कि विश्व संस्कृति के महानायक भी हैं। वे इस देव संस्कृति के नायक हैं। भले राम के जीवनकाल को समाप्त हुए सहस्त्र वर्ष से अधिक का समय बीत हो गया हो, लेकिन भारतीय जनमानस में आज भी राम जीवंत हैं। भारतीय संस्कृति में राम का महत्व सदियों-सदियों से विद्यमान है। राम को धर्म, जाति, देश और काल तक सीमित नहीं किया जा सकता। राम दुनिया की महाशक्ति हैं। जीवन की प्रत्येक समस्या के निवारण का रहस्य राम नाम में निहित है। राम देश के गौरव, संस्कृति की पहचान और स्वाभिमान भी हैं। राम के चरित्र में गंभीरता, विचारशीलता, साहस और बड़ों को दिया जाने वाला सम्मान है। अटक से कटक तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश राम नाम में रचा बसा है।
लोक के राम और भारत : सुदूर उत्तर पूर्व के मणिपुर में रामानंदी संप्रदाय में रामकथा का प्रचलन सदियों से है। वहां दशहरे को रामणकप्पा यानी रावण के वध का दिन मनाते हैं। सन् 1467 में मणिपुर के राजा कियांबा को बर्मा (अब म्यांमार) के पोंग राजा खेखोंभा ने भगवान विष्णु की मूर्ति भेंट की थी, तब राजा कियांबा ने रामानंदी संप्रदाय का व्यापाक प्रचार-प्रसार शुरू कराया था। असम में रामकथा लोक संस्कृति, लोकनाट्य, चित्रकला, काव्य में है। यहां राम भौतिकवादी युग में तनाव से मुक्ति का एक साधन हैं तो उड़ीसा में उड़िया भाषा में रामलीला का मंचन होता है। जगन्नाथ पुरी में रामनवमी को भव्य रूप से मनाया जाता है और रामानुज संप्रदाय का एम्मार मठ यहीं पर स्थित है। बुंदेलखंड के प्रसिद्ध दीवार नृत्य में राम का प्रभाव है। ब्रज में भले कृष्ण लीला होती है, लेकिन यहां रामलीला का मंचन उतना ही लोकप्रिय है। बिहार में मिथिलांचल की चित्रकारी में राम हैं तो राजस्थान के मेवाड़, कोटा, बूंदी, अलवर, बीकानेर और जयपुर में रामचरित्र मानस और वाल्मीकि रामायण के आधार पर अद्भुत चित्र देखने को मिल जाते हैं। राजस्थानी लोकगीतों में राम के चरित्र का गायन है।
दक्षिण भारत में कर्नाटक के हर घर में रामप्पा, रामयप्पा, रामचंद्रया, रामाचंद्रप्पा, रामचंद्र राव, रामराव जैसे नाम घर-घर में मिल जाएंगे। कर्नाटक के लोक संगीत में रामप्रिय और रघुप्रिय राग हैं। कन्नड़ गीतों, लोक परंपरा और त्योहारों में राम की संस्कृति का प्रभाव है। यक्षगान और नृत्य में रामकथा का मंचन होता है। आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में जटायू ने रावण से युद्ध किया तो पंचवटी गोदावरी नदी के तट पर शबरी का आश्रम है। यहां किष्किंधा पर्वत पर सुग्रीव और राम की मित्रता हुई थी। केरल और तमिलनाडु में राम का प्रभाव साफ-साफ दिखता है। भले यहां रावण, मेघनाथ और कुंभकरण का पुतला नहीं जलाया जाता हो, लेकिन दशहरा पर रामायण का पाठ होना अनिवार्य है।तमिल की कम्ब रामायण को आदर के साथ पढ़ा जाता है। केरल में रामकथा गाकर पंडारण जाति अपनी आजीविका को चलती है, जिसे सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। केरल में कच्चू रामन, कच्यूरामन, रामपुरम, रामनगरी, रामनाट्यपुरम जैसे कई स्थान हैं। समस्त भारत में पग-पग पर राम बसे हैं।राम हमारी संस्कृति में रच-बस गए हैं। राम का नाम दुनिया की महाऔषधि है। हर परेशानी का हाल राम नाम में निहित है। राम का नाम हमें ब्रह्म सुख की अनुभूति कराता है। राम हमारी संस्कृति के राजा भी हैं, आदर्श पुत्र भी हैं और श्रेष्ठ वनवासी भी हैं। हमारी संस्कृति की कल्पना राम के बिना अधूरी है।








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