हिंदी पत्रकारिता जगत से एक बेहद पीड़ादायक और मन को झकझोर देने वाली खबर सामने आई है। वर्ष 1991 में शुरू हुआ प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक “राष्ट्रीय सहारा” अब इतिहास के पन्नों में सिमट गया है। 8 जनवरी 2026 से अख़बार का प्रकाशन पूरी तरह बंद कर दिया गया है। दिल्ली संस्करण पहले ही दो माह पूर्व बंद हो चुका था, जबकि अब लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, गोरखपुर, देहरादून, पटना समेत देशभर के सभी संस्करणों का प्रकाशन “अगले आदेश तक” स्थगित कर दिया गया है। बताया जा रहा है कि 8 जनवरी 2026 से बिना किसी पूर्व सूचना के प्रबंधन ने अचानक अख़बार छापना बंद कर दिया। इस अप्रत्याशित फैसले ने सैकड़ों पत्रकारों, कर्मचारियों और उनके परिवारों को गहरे संकट और अनिश्चित भविष्य के अंधेरे में धकेल दिया है।
बिना वेतन, बिना सुरक्षा
राष्ट्रीय सहारा से जुड़े कर्मचारियों का दर्द सिर्फ नौकरी छिनने तक सीमित नहीं है। उनका आरोप है कि लंबे समय से वेतन, पीएफ, ईएसआई और ग्रेच्युटी जैसे वैधानिक बकायों का भुगतान नहीं किया गया। विडंबना यह है कि आयकर विभाग को दिए गए फॉर्म-16 में वेतन भुगतान दर्शाया गया, जबकि वास्तविकता में कर्मचारियों को पैसा नहीं मिला। अचानक प्रकाशन बंद होने से सैकड़ों घरों संकट खड़ा हो गया है।
बिना नोटिस, बिना संवाद
श्रम विभाग में पहुंचा मामला
कई यूनिटों के पत्रकारों और कर्मचारियों ने श्रम विभाग में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। मामले को गंभीरता से लेते हुए अपर श्रमायुक्त कार्यालय ने 12 जनवरी 2026, दोपहर 3 बजे सुनवाई की तिथि तय की है। इस संबंध में सहारा इंडिया मीडिया के वरिष्ठ अधिकारियों—सीईओ सुमित राय, यूनिट हेड अजीत बाजपेयी और प्रशासनिक हेड —सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर पेश होने के निर्देश दिए गए हैं।
1991 से 2026: एक युग का अंत करीब 34–35 वर्षों तक राष्ट्रीय सहारा ने हिंदी पत्रकारिता में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखी। सामाजिक सरोकार, ग्रामीण भारत, आम आदमी की पीड़ा और सत्ता से सवाल पूछने वाली पत्रकारिता इसकी पहचान रही। इसके बंद होने को मीडिया जगत में एक युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है। डि डिजिटल राष्ट्रीय सहारा की वेबसाइट और ई-पेपर अभी सीमित रूप में दिखाई दे रहे हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म को भविष्य में जारी रखा जाएगा या नहीं। 00000000000000000000000000000
पत्रकारिता जगत में शोक
अब सबकी निगाहें श्रम विभाग और कानूनी प्रक्रिया पर टिकी हैं इस उम्मीद के साथ कि कर्मचारियों को उनका हक़, उनका सम्मान और उनका भविष्य वापस मिल सके।










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