बिहार चुनाव: कल होगा 122 सीटों पर अंतिम चरण के चुनाव
– आज है कत्ल की रात, सभी पार्टी प्रत्याशी सजग, सीमांचल पर है सबकी नजर
बिहार चुनाव से अशोक झा: बिहार चुनाव के अंतिम चरण के लिए प्रचार खत्म हो गया है। 11 नवंबर को दूसरे चरण में बिहार की 122 विधानसभा सीटों पर चुनाव होने वाला है।मंगलवार को मतदान होगा और शुक्रवार को नतीजे सामने आएंगे। दूसरे चरण से पहले भारत-नेपाल सीमा को सील कर दिया गया है। इस दौरान बॉर्डर पर एसएसबी (सशस्त्र सीमा बल) हाई अलर्ट पर है। बताया गया कि बॉर्डर पर 72 घंटे के लिए आवागमन बंद कर दिया गया है। पहले चरण के रुझानों ने चुनावी समीकरणों को नया आयाम दिया है, जिसे ध्यान में रखकर सभी दल दूसरे चरण में बेहतर प्रदर्शन की कोशिश करेंगे।।दूसरे चरण में जिन 20 जिलों में मतदान होगा उनमें पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, शिवहर, मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, भागलपुर, बांका, जमुई, नवादा, गया, औरंगाबाद, जहानाबाद, अरवल, कैमूर और रोहतास शामिल हैं। दूसरे चरण में 20 जिलों की 122 विधानसभा सीटों पर मतदान होना है. इसके लिए 45339 मतदान केंद्र बनाएं गए हैं। इनमें से 4109 बूथों को संवेदनशील बनाया गया है. इसमें 4003 अतिसंविदनशील बूथ घोषित हैं। यहां पर चार बजे तक मतदान होगा। कटोरिया, बेलहर, चैनपुर, चेनारी, गोह, नवीनगर, कुटुंबा, औरंगाबाद, रफीगंज, गुरुआ, शेरघाटी, इमामगंज, बाराचट्टी के (छत्तिस बूथ), बोधगया (दो सौ बूथ), रजौली, गोविंदपुर, सिकंदरा, जमुई, झाझा, चकाई विधानसभा में बनाए गए बूथों पर शाम चार बजे मतदान होगा। वहीं बोधगया में एक सौ छह बूथों पर शाम पांच बजे तक मतदान होगा। इन बूथों पर पर्याप्त संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात रहने का निर्देश दिया गया है। बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के लिए प्रचार का शोर रविवार शाम पांच बजे थम गया। अब पूरी बागडोर जनता के हाथों में है, जो सोमवार 11 नवंबर को मतदान करके यह तय करेगी कि सत्ता की कुर्सी पर कौन बैठेगा। बिहार चुनाव के दूसरे इस चरण में 20 जिलों की 122 विधानसभा सीटों पर वोटिंग होगी. इनमें 101 सामान्य, 19 अनुसूचित जाति और 2 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटें शामिल हैं. कुल 3 करोड़ 70 लाख 13 हजार 556 मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे. इस चरण में प्रत्येक बूथ पर औसतन 815 मतदाता दर्ज हैं, जो शांतिपूर्ण मतदान की उम्मीद को संतुलित रखते हैं.बिहार प्रदेश में दूसरे और अंतिम चरण के मतदान से पहले भारत-नेपाल सीमा पर निगरानी बढ़ा दी गई है. भारत-नेपाल बॉर्डर को 11 नवंबर की रात तक सील कर दी गई है। इस दौरान सीमा पर लोगों के आने-जाने पर रोक लगा दी गई है।दूसरे चरण में कई मंत्रियों की प्रतिष्ठा दांव पर: इस चरण में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कई मंत्री चुनाव लड़ रहे हैं, जिनमें सुपौल से बिजेंद्र प्रसाद यादव, चकाई से सुमित कुमार सिंह, झंझारपुर से नीतीश मिश्रा, अमरपुर से जयंत राज, छातापुर से नीरज कुमार सिंह बबलू, बेतिया से रेणु देवी, धमदाहा से लेशी सिंह, हरसिद्धि से कृष्णनंदन पासवान और चैनपुर से जमा खान शामिल हैं। बिहार चुनाव: राहुल गांधी बोले- देश को बांटने की कोशिश कर रहे BJP-RSS, एकजुट कर रहा इंडिया गठबंधन
महागठबंधन के कई बड़े नेता भी मैदान में: वहीं, दूसरे चरण में महागठबंधन की ओर से आरजेडी के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम, कटिहार की कदवा सीट से कांग्रेस विधायक दल के नेता शकील अहमद खान, तथा भाकपा (माले) विधायक दल के नेता महबूब आलम उम्मीदवार हैं। दूसरे चरण के लिए 1302 उम्मीदवार चुनावी मैदान में : दूसरे चरण में एनडीए के घटक दलों के बीजेपी के 53 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला होना है। पहले चरण में बीजेपी के 48 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में बंद हो चुकी है। जेडीयू के 44, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के 15, राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के चार और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के छह उम्मीदवार भी दूसरे चरण में चुनावी मैदान में हैं। दूसरे चरण में राज्य के 20 जिलों की 122 विधानसभा सीट पर 11 नवंबर को सुबह 7 बजे से मतदान होगा। इस चरण में 1302 प्रत्याशी मैदान में हैं, जिनमें 136 महिलाएं, 1165 पुरुष और एक तृतीय लिंग प्रत्याशी शामिल हैं। कुल 3,70,13,556 मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। दूसरे चरण का गणित: दूसरे चरण में 20 जिलों की 122 सीटों पर वोटिंग होगी. पहले चरण में 121 सीटों पर मतदान हुआ था. इस बार 1,302 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें 136 महिलाएं शामिल हैं. कुल 3.70 करोड़ मतदाता अपने वोट डालेंगे, 1.95 करोड़ पुरुष और 1.74 करोड़ महिलाएं. इनके लिए 45,399 मतदान केंद्र बनाए गए हैं।
पिछले चुनाव 2020 में इन 122 सीटों पर भाजपा ने 42, आरजेडी ने 33, जदयू ने 20, कांग्रेस ने 11 और वाम दलों ने 5 सीटें जीती थीं. 2015 में जदयू-आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन मजबूत स्थिति में था और 80 सीटें जीतकर आगे रहा था।
क्षेत्रीय समीकरण: दूसरे चरण की सीटें बिहार के मध्य, पश्चिमी और उत्तरी हिस्सों में फैली हैं. तिरहुत, सारण और उत्तरी मिथिला भाजपा के पारंपरिक गढ़ रहे हैं. इनमें पूर्वी पश्चिमी चंपारण, शिवहर, सीतामढ़ी और सारण शामिल हैं. वहीं जदयू की पकड़ भागलपुर क्षेत्र में मजबूत मानी जाती है.
दूसरी तरफ महागठबंधन का प्रभाव मगध क्षेत्र में गहरा है. गया, औरंगाबाद, नवादा, जहानाबाद और अरवल जिलों में राजद और उसके साथी पार्टनर बेहतर स्थिति में रहे हैं. कांग्रेस इस क्षेत्र में कमजोर है और अपने सहयोगियों पर निर्भर है.
सीमांचल में सियासी संग्राम: इस चरण का सबसे बड़ा केंद्र सीमांचल है. पूर्णिया, अररिया, किशनगंज और कटिहार की 24 सीटें राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मानी जाती हैं. सीमांचल में बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी रहती है और यही वोट इस क्षेत्र में चुनाव का असली निर्णायक बन जाता है.
2020 में AIMIM ने पांच सीटें जीतकर सीमांचल में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई थी, हालांकि बाद में उसके चार विधायक राजद में शामिल हो गए. भाजपा ने यहां आठ, जदयू ने चार, कांग्रेस ने पांच और राजद-वाम दलों ने एक-एक सीट जीती थी। इस बार सीमांचल में सभी दलों ने आक्रामक कैंपेन चलाया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की रैलियों से लेकर राहुल गांधी की ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ तक हर पार्टी ने यहां पूरी ताकत झोंक दी है। जातीय गणित की भूमिका: बिहार की सियासत में जातीय समीकरण हमेशा अहम रहे हैं. दूसरे चरण में 36 प्रतिशत की हिस्सेदारी वाला अति पिछड़ा वर्ग महत्वपूर्ण फैक्टर साबित हो सकता है. नीतीश कुमार की राजनीति में यह वर्ग अब तक गेम-चेंजर रहा है.
राहुल गांधी इस बार इस वोट बैंक को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. एनडीए यादव वर्चस्व वाले वोट बैंक का मुकाबला करने के लिए गैर यादव ओबीसी पर फोकस कर रहा है. आरा, बक्सर और रोहतास में अनुसूचित जाति वोट भी कई सीटों पर जीत-हार तय करेंगे। अंतिम मोड़ पर चुनाव: दूसरे चरण की वोटिंग से पहले सभी दलों ने पूरा जोर लगा दिया है. पहले चरण की ऐतिहासिक वोटिंग के बाद अब निगाहें इस चरण पर हैं।सीमांचल क्षेत्र बिहार के चार जिलों- किशनगंज, पूर्णिया, अररिया, और कटिहार- पर आधारित है। इन जिलों में मुस्लिम आबादी का खासा प्रभाव है, जिससे यह क्षेत्र चुनावी परिणामों पर सीधा असर डालता है। माइनॉरिटी कमीशन के आंकड़ों के अनुसार:किशनगंज: मुस्लिम आबादी 67%
कटिहार: मुस्लिम आबादी 42%अररिया: मुस्लिम आबादी 41%
पूर्णिया: मुस्लिम आबादी 37% इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि सीमांचल में मुस्लिम मतदाताओं का वोट बैंक काफी बड़ा है और चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है। ओवैसी का प्रभाव और नया समीकरण 2020 के विधानसभा चुनाव में AIMIM (ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन) ने सीमांचल में अप्रत्याशित सफलता हासिल की थी। ओवैसी की पार्टी ने अमौर, बहादुरगंज, बायसी, जोकीहाट, और कोचाधामन जैसी सीटों पर जीत दर्ज कर परंपरागत मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाई थी। अब 2025 के चुनाव में ओवैसी फिर से सीमांचल में उसी रणनीति के साथ मैदान में हैं, लेकिन इस बार उन्हें प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी से चुनौती मिल रही है। जनसुराज पार्टी सीमांचल में विकास और शासन सुधार के मुद्दों पर सक्रिय है, और उनकी पार्टी का लक्ष्य मुस्लिम वोट बैंक को तोड़कर महागठबंधन को नुकसान पहुंचाना है।
जनसुराज और AIMIM का उद्देश्य: राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, जनसुराज और AIMIM दोनों का मुख्य उद्देश्य महागठबंधन (RJD-कांग्रेस) के वोट बैंक को कमजोर करना है। ओवैसी जहां धार्मिक पहचान के आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण कर रहे हैं, वहीं प्रशांत किशोर ग्रामीण इलाकों और युवाओं के बीच अपने गांव-गांव जनसंवाद अभियान के जरिए वैकल्पिक राजनीति का विकल्प पेश कर रहे हैं। महागठबंधन और NDA की रणनीतियां: महागठबंधन के लिए मुख्य चुनौती मुस्लिम-यादव (MY) गठबंधन को बनाए रखना है, जो बिहार की राजनीति में हमेशा अहम रहा है। वहीं, NDA (BJP-जदयू) सीमांचल में “विकास बनाम पहचान” की राजनीति पर जोर दे रही है। भाजपा और जदयू ने सड़क, शिक्षा, रोजगार, और सुरक्षा जैसे स्थानीय मुद्दों के माध्यम से अल्पसंख्यक मतदाताओं तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश की है।
चतुष्कोणीय मुकाबला: सीमांचल में नये समीकरण: ।2025 के विधानसभा चुनाव में सीमांचल का राजनीतिक परिदृश्य अब त्रिकोणीय नहीं बल्कि चतुष्कोणीय हो चुका है। महागठबंधन, NDA, AIMIM, और जनसुराज, ये चारों राजनीतिक दल और गठबंधन अब अपनी-अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटे हैं। तेजस्वी यादव के लिए चुनौती मुस्लिम-यादव गठजोड़ को बनाए रखना है, जबकि नीतीश कुमार अपने विकास एजेंडे को बढ़ावा दे रहे हैं। इस बार ओवैसी और प्रशांत किशोर का प्रभाव भी सत्ता के समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। सीमांचल की 24 सीटें सत्ता का बैरोमीटर : राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, सीमांचल की 24 सीटें बिहार की सत्ता का बैरोमीटर मानी जाती हैं। 2020 में महागठबंधन यहां से पिछड़ गया था, और अब 2025 में भी यही इलाका सत्ता परिवर्तन का निर्णायक कारक बन सकता है। सीमांचल की सीटों पर होने वाली लड़ाई की दिशा और तेज होगी, क्योंकि यह इलाका बिहार के चुनावी परिदृश्य में हमेशा अहम रहा है। यह चरण तय करेगा कि बिहार की अगली सरकार किसकी होगी और किसकी रणनीति जनता के दिल तक पहुंची।








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