
– विजय सिंहा के घर पहुंचे तेज प्रताप, लगाए जा रहे है कई प्रयास
– मलमास (खरमास) खत्म होते ही नीतीश मंत्रिमंडल का होगा विस्तार
– इस बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पटेल समाज के भोज में शामिल हुए
अशोक झा/ पटना: बिहार में एक बार फिर पारंपरिक दही-चूड़ा की दावत राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र बना है। आज उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा के आवास पर दही-चूड़ा की दावत का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें नीतीश कुमार भी शामिल होंगे।
इनमें कुछ काम तो पूर्व निर्धारित शिड्यूल का हिस्सा हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के गठन के बाद से ही कैबिनेट विस्तार की चर्चा होती रही है। कयास लगाए जाते रहे हैं कि मलमास (खरमास) खत्म होते ही नीतीश मंत्रिमंडल का विस्तार करेंगे। जेडीयू में संगठनिक बदलाव की भी जोरदार चर्चा है। इतना ही नहीं, गैर एनडीए विधायकों की टूट-फूट की चर्चाएं भी तेज हैं। दही-चूड़ा भोज तो परंपरागत रूप से सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व को दर्शाता है, लेकिन अक्सर राजनीतिक डील्स और गंठजोड़ का भी यह अनुकूल अवसर बनता रहा है। मकर संक्रांति पर दही-चूड़ा भोज का आयोजन राजनीतिक दलों के लिए एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म है। इस बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पटेल समाज के भोज में शामिल हुए। संयोगवश उसी कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे आरसीपी की भी उपस्थिति रही. आरसीपी के इस मौके पर आए बयान से राजनीतिक खिचड़ी पकने का संदेश मिला।जनशक्ति जनता दल (जेजेडी) के अध्यक्ष तेजप्रताप यादव एक बार फिर सियासी गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गए हैं. इस बार वजह है मकर संक्रांति पर होने वाला उनका दही-चूड़ा भोज, जिसके जरिए वे अपने पिता लालू प्रसाद यादव की वर्षों पुरानी परंपरा को न केवल जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि उसे अपनी नई राजनीतिक पहचान से भी जोड़ रहे हैं।
आरसीपी सिंह फिर जाएंगे जेडीयू में!:आरसीपी सिंह पटेल सेवा संघ के कार्यक्रम में तब पहुंचे, जब नीतीश कुमार जा चुके थे। पर, उन्होंने जो कुछ कहा, उससे यह संकेत तो सार्वजनिक हो ही गया कि जेडीयू में उनके जाने की संभावनाएं फिर से बन सकती हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि वे और नीतीश कुमार एक ही हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि पिछले 25 साल से दोनों के संबंध हैं और वे एक दूसरे को बेहतर जानते समझते हैं. जेडीयू से निकाले जाने के बाद आरसीपी सिंह ने भाजपा ज्वाइन की। भाजपा में भाव न मिलते देख उन्होंने अपनी पार्टी आसा बनाई. फिर आसा का प्रशांत किशोर के नेतृत्ववाली जन सुराज पार्टी में विलय कर दिया। अब अगर वे नीतीश से पुराने और दीर्घकालिक संबंधों को हवाला दे रहे हैं तो निश्चित ही इसके के लिए सियासी खिचड़ी पकने की भनक मिल रही है. संभव है कि वे जन सुराज को भी बाय बोल दें और फिर से नीतीश कुमार के साथ आ जाएं. बिहार में आमतौर पर इस तरह के कामों के लिए दही-चूड़ा भोज अनुकूल अवसर होता है.
JDU में सांगठनिक बदलाव की चर्चा
बिहार में जेडीयू की जबरदस्त वापसी के बाद ये कयास लग रहे हैं कि नीतीश कुमार बड़े पैमाने पर सांगठनिक बदलाव भी करेंगे. फिलहाल नीतीश कुमार ही जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और राज्यसभा सांसद संजय कुमार झा कार्यक्रारी अध्यक्ष का काम संभाल रहे हैं. जेडीयू के बिहार प्रदेश उमेश कुशवाहा भी कहते हैं कि पार्टी में सांगठनिक फेर-बदल तो होना ही है. यह काम दही-चूड़ा भोज के बाद हो सकता है. यह सभी जानते हैं कि संजय झा के कार्यकारी अद्यक्ष रहते जेडीयू ने इस बार विधानसभा चुनाव में जबरदस्त वापसी की है. 2020 में जेडीयू जहां 43 सीटों के साथ विधानसभा में तीसरे नंबर की पार्टी बन गई थी, वहीं उसने इस बार 85 सीटें जीत कर जबरदस्त वापसी की है. इतना ही नहीं, जेडीयू विधायकों के कुनबे में बढ़ोतरी होने की खबरें भी मीडिया में आती रही हैं. संभव है कि संजय झा को नीतीश कुमार इस बार कोई बड़ी जिम्मेवारी सौंपें. प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा की जगह भी बिहार को जेडीयू किसी नए अध्यक्ष की घोषणा कर सकता है।
टूट सकते हैं उपेंद्र कुशवाहा के MLA
जेडीयू में अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसप) का उपेंद्र कुशवाहा ने विलय कर दिया था. पर, कुछ ही दिनों बाद नीतीश कुमार से उनकी नाराजगी बढ़ने लगी. फिर उन्होंने जेडीयू से अलग होकर राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरलएम) बना ली. लोकसभा चुनाव के वक्त उपेंद्र कुशवाहा एनडीए का हिस्सा बन गए. एनडीए में रहते आरएलएम ने विधानसभा का चुनाव लड़ा. उनकी पार्टी के 4 विधायक चुन लिए गए, जिनमें एक उनकी पत्नी भी हैं. यहां तक तो ठीक था, लेकिन जैसे ही उन्होंने अपने बेटे दीपक प्रकाश को बिना किसी सदन का सदस्य रहते मंत्री बनवा दिया, तब से आरएलएम में खटपट शुरू हो गई है. उनके 3 विधायक कुशवाहा के इस कदम से खासा खफा हैं. हाल ही में उन्होंने भोज का आयोजन किया था तो उसमें उनके 3 विधायक नदारद रहे. कहा जा रहा है कि नाराज विधायक पाला बदलने का मन बना चुके हैं. इस बाबत वे जेडीयू नेताओं के संपर्क में हैं. अगर मलमास बाद सियासी उथल-पुथल होतीहै तो इनके जेडीयू में शामिल होने की संभवनाएं सर्वाधिक हैं. तब यह भी हो सकता है कि उपेंद्र कुशवाहा अपनी पार्टी का ही फिर जेडीयू में विलय कर दें. ऐसे में, इस रहस्य से भी दही-चूड़ा भोज के बाद पर्दा हटने की संभावना है.
कांग्रेस के 3 विधायकों पर भी संदेह
तेजस्वी के नेतृत्व वाले महागठबंधन के बैनर तले चुनाव लड़ कर कांग्रेस के 6 विधायक इस बार निर्वाचित हुए हैं. चुनाव नतीजे घोषित होने के बाद से ही यह चर्चा जोरों पर हैं कि उनमें 3 पार्टी नेतृत्व से नाराज चल रहे हैं. कई बैठकों में उनकी गैरहाजिरी से इस चर्चा को बल मिला है कि वे पाला बदलने की तैयारी में हैं. कांग्रेस ने दही-चूड़ा भोज का आयोजन किया तो उसमें सहयोगी दलों ने शिरकत करना जरूरी नहीं समझा. यहां तक कि पटना में रहते हुए खुद तेजस्वी यादव भी नहीं पहुंचे. नाराज चल रहे तीनों विधायक भी नदारद रहे. इनके बारे में भी यही कयास लगाए जा रहे हैं कि मकर संक्रांति बाद वे सत्तादारी खेमे के शरणागत हो जाएंगे. वैसे भी कांग्रेस में टूट की परंपरा कोई नई बात नहीं है. इसके पहले अशोक चौधरी समेत कांग्रेस के कई एमएलसी जेडीयू में शामिल हो गए थे. निचले स्तर के दर्जनभर से अधिक नेताओं ने भी जेडीयू के साथ जाना पसंद किया था. कांग्रेस विधायकों के टूटने की चर्चा में कितना दम है, यह भी मलमास खत्म होने के बाद साफ हो जाएगा.
चर्चा तो RJD में भी टूट की हो रही
विधायकी की शपथ लेने के बाद करीब डेढ़ महीने तक तेजस्वी की विदेश यात्रा पर रहने की चर्चाएं भी बिहार के राजनीतिक गलियारे में खूब हुई. 25 विधायकों के कारण तेजस्वी नेता प्रतिपक्ष तो बन गए, लेकिन वे इस पद पर बरकरार रह पाएंगे, इसमें संदेह है. एलजेपीआर के विधायक और मंत्री संजय सिंह ने कहा है कि आरजेडी के कई विधायक एनडीए के संपर्क में हैं. यानी वे आरजेडी से अलग होना चाहते हैं. हालांकि वे टूट के बाद किस दल के साथ जाएंगे, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है. कहा जा रहा है कि आरजेडी के जो 25 विधायक जीते हैं, उनमें जेढ़ दर्जन ऐसे हैं, जो पहली बार जीत कर विधायक बने हैं. तेजस्वी की अन्यमनस्कता से वे आहत हैं. शायद यही वजह है कि जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने कई बार कहा है कि आरजेडी के 18 विधायक लगातार एनडीए के संपर्क में है. अगर ऐसा है तो मलमास बाद यह भी स्पष्ट हो जाएगा क आरजेडी में टूट होती है या नहीं. कभी लालू का दाहिना हाथ रहे और भाजपा कोटे से बिहार में मंत्री बने रामकृपाल यादव भी कई बार यह बात दोहरा चुके हैं कि आरजेडी के विधायक एनडीए के संपर्क में हैं. ऐसा हुआ तो तेजस्वी से नेता प्रतिपक्ष का दर्जा भी छिन सकता है.
निशांत की चर्चा का सस्पेंस उजागर
नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री की खबरें भी समय-समय पर आती रही हैं. कहा जा रहा है कि संगठन के जरिए उनकी सिासत में एंट्री हो सकती है. कुछ लोग यह भी कह रहे कि विधान परिषद के जरिए राजनीति में उनकी ग्रैंड एंट्री कराई जा सकती है. चूंकि इसी साल राज्यसभा और विधान परिषद की कुछ सीटों के लिए चुनाव भी होने हैं. इसलिए इस संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता. हालांकि अभी तक निशांत या नीतीश ने इस बाबत अपनी जुबान से कुछ नहीं कहा है. निशांत को राजनीति में लाने के लिए समर्थक पोस्टर-बैनर लगाते रहते हैं. नए साल पर इस तरह के पोस्टर-बैनर पटना में दिखे. अगर इस बात में दम है तो इसके लिए मकर संक्रांति मुफीद मौका हो सकता है. यानी ऐसा न भी हो तो दही-चूड़ा भोज में इसके स्पष्ट संकेत मिल सकते हैं.
नीतीश मंत्रिमंडल का विस्तार संभव
नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल का विस्तार भी लटका पड़ा है. चर्चा है कि 9-10 नए मंत्री बनाए जा सकते हैं. इनमें 6 भाजपा के होंगे और 3-4 जेडीयू के हो सकते हैं. साथी दलों को उनके हिस्से का मंत्री पद मिल चुका है. अब जो भी होना है, वह भाजपा और जेडीयू विधायकों के लिए होगा. संभावित मंत्रियों के नाम भी उछल रहे हैं. कहा जा रहा है कि मलमास खत्म होते ही नीतीश मंत्रिमंडल का विस्तार करेंगे. असदुदद्दीन ओवैसी की पार्टी के 5 विधायक इस बार भी जीते हैं. वे भी पाला बदल सकते हैं. पर, ऐसा वे ततभी करेंगे, जब उनमे किसी को मंत्री बनने का मौका मिले. आरएलएम के बागी 3 विधायक साथ आते हैं तो उनमें भी किसी को मंत्री बनने का मौका मिलना चाहिए. कैबिनेट विस्तार से पहले यह टूट एनडीए को मजबूत कर सकती है.
CM नीतीश या सम्राट, मिलेगा संकेत
एनडीए में जेडीयू के 85 और भाजपा के 89 विधायक हैं. तोड़-फोड़ होने पर यह संख्या बढ़ सकती है. ऐसे में किस दल के साथ कितने विधायक होंगे, संख्या स्पष्ट हो जाएगी. पहले से ही यह चर्चा होती रही है कि भाजपा अपना सीएम बनाना चाहती है. सम्राट चौधरी को गृह मंत्रालय मिलने के बाद इसकी संभावना बढ़ गई है. वैसे भी नीतीश कुमार ने सार्वजनिक रूप से कह दिया है कि सम्राट बहुत आगे जाएंगे. कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा इसके लिए बंगाल विधानसभा चुनाव का इंतजार करेगी. बंगाल में यदि भाजपा कामयाब हो जाती है तो बिहार में सरकार का नेतृत्व बदल सकता है. नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की केसी त्यागी के बाद आरसीपी सिंह की ताजा मांग से भी संकेत मिलते हैं कि नीतीश कुमार अब राजनीति से संन्यास ले सकते हैं. हालांकि उनकी अत्यधिक सक्रियता से इस चर्चा में दम नहीं दिखता. बहरहाल, मकर संक्रांति के बाद इसके पुख्ता संकेत सामने आ सकते हैं।








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