अशोक झा
लद्दाख के लेह में 24 सितंबर को सरकार के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा में चार लोगों की मौत के बाद लागू कर्फ्यू में शनिवार को स्थिति में सुधार होने के संकेत मिलने के बाद दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक ढील दी गई है। लद्दाख के डीजीपी एसडी सिंह जमवाल ने कहा कि लद्दाख एपेक्स बॉडी (एलएबी) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) के नेताओं को विश्वास में लेने के बाद जरूरी सामान खरीदने के लिए लोगों को छूट देने के लिए कर्फ्यू में ढील दी गई। एलएबी और केडीए के शीर्ष निकायों और केंद्र सरकार के बीच चल रही बातचीत में कई काम पहले ही हो चुके हैं। डीजीपी ने कहा, “लद्दाख देश का एकमात्र ऐसा क्षेत्र है, जहां स्थानीय लोगों को 85 प्रतिशत आरक्षण मिलता है। काउंसिल में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। स्थानीय संस्कृति की रक्षा के लिए, बर्गी और बोदी भाषाओं को आधिकारिक दर्जा दिया गया है।
डीजीपी जमवाल ने कहा कि जब ये सब हो रहा था, तब कुछ कथित सामाजिक कार्यकर्ता, खासकर सोनम वांगचुक, जिनकी विश्वसनीयता पर संदेह है, ने लद्दाख में शांतिपूर्ण माहौल को खराब करने की कोशिश की।” उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी, और उन्हें यह बताने के बावजूद कि इन कामों से चल रही बातचीत पर असर पड़ेगा, इन लोगों ने लगभग 5000-6000 लोगों, जिनमें समाज विरोधी तत्व भी शामिल थे, को उकसाया, जिन्होंने सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया।
क्या थी गोली चलाने की वजह?: उन्होंने कहा, “आत्मरक्षा में (सुरक्षा बलों द्वारा) गोलीबारी की गई और 4 दुर्भाग्यपूर्ण मौतें हुईं। पहले दिन 32 लोग गंभीर रूप से घायल हुए और उसके बाद कई और घायल हुए। मुझ पर भी हमला हुआ लेकिन मैं सौभाग्य से मामूली चोटों के साथ बच गया। गंभीर रूप से घायल कर्मियों में से 17 सीआरपीएफ के और 15 लद्दाख पुलिस के थे। बाद में यह संख्या बढ़कर 70-80 हो गई। 70-80 नागरिक भी घायल हुए। 6-7 लोग अभी भी लद्दाख के अस्पताल में हैं।” सोनम वांगचुक को लेकर कही ये बात:
डीजीपी ने कहा, “यह सिर्फ एक घटना है, मुझे लगता है कि लद्दाख फिर से पुनर्जीवित होगा और वहां लोगों के लिए वही संस्कृति और आतिथ्य होगा।” उन्होंने कहा, “लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद से ही छठी अनुसूची और राज्य के दर्जे की राजनीतिक मांग उठ रही है। लेह एपेक्स बॉडी और केडीए ने सरकार के साथ लंबी चर्चा की है। यह एक सतत प्रक्रिया है, लेकिन इस प्रक्रिया को विफल करने के प्रयास भी किए जा रहे थे। एक तथाकथित पर्यावरण कार्यकर्ता और अपनी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाने वाले ऐसे ही अन्य समूहों ने इस मंच को हाईजैक करने का प्रयास किया। इसमें पहला नाम सोनम वांगचुक का है। जिन्होंने पहले भी इस तरह की कोशिश की। लेह में हाल ही में हुई हिंसा के लिए सरकार द्वारा पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जिम्मेदार ठहराने के बाद शुक्रवार (26 सितंबर) को उन्हें कठोर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया और एक हजार किलोमीटर से भी अधिक दूर जोधपुर भेज दिया गया है। मालूम हो कि सोनम वांगचुक लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा की मांग करने वाले लोकप्रिय आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहे हैं। हिंसा से पहले वे लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और छठी अनुसूची के विस्तार की मांग को लेकर अन्य लोगों के साथ भूख हड़ताल पर थे। रिपोर्ट के मुताबिक, उनकी गिरफ्तारी को उचित ठहराते हुए शुक्रवार देर रात जारी केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के प्रशासन ने दावा किया कि सोनम वांगचुक को ‘बार-बार राज्य की सुरक्षा के लिए प्रतिकूल गतिविधियों में लिप्त देखा गया है. ये शांति और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और समुदाय के लिए आवश्यक सेवाओं के लिए खतरनाक है।सोनम वांगचुक के बारे में एक सवाल के जवाब में पुलिस प्रमुख ने कहा कि सोनम वांगचुक का प्रोफाइल और इतिहास यूट्यूब पर उपलब्ध है। डीजीपी ने कहा, “वांगचुक ने लोगों में नफरत फैलाने के लिए नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका के बारे में बात की है। उसका अपना एजेंडा है।” उन्होंने बताया कि एक पाकिस्तानी आतंकी एजेंट, जो वांगचुक के संपर्क में था और पाकिस्तान को उसकी रिपोर्ट भेज रहा था, उसे गिरफ्तार कर लिया गया है। एफसीएआरए उल्लंघन की जांच चल रही है और इसके अलावा मैं कुछ नहीं कह सकता क्योंकि जांच जारी है।” उन्होंने यह भी कहा कि जब वे हिंसक प्रदर्शन कर रहे थे, तब तीन नेपाली घायल हो गए थे और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। प्रेस विज्ञप्ति में इस बात का कोई ब्यौरा नहीं दिया गया कि अतीत में ये ‘गतिविधियां’ क्या थीं, लेकिन लेह में 24 सितंबर की हिंसा के लिए सीधे तौर पर वांगचुक को जिम्मेदार ठहराया गया, जो उस समय भूख हड़ताल पर थे, जब आक्रोशित भीड़ ने प्रशासन पर अपना गुस्सा उतारा था। प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया गया है, ‘उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) की बैठक के लिए सरकार की ओर से स्पष्ट सूचना और एचपीसी से पहले बैठकों की पेशकश के बावजूद श्री सोनम वांगचुक ने अपने गुप्त उद्देश्य से अपनी भूख हड़ताल जारी रखी।
सोनम वांगचुक को सरकार ने लेह हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया: इसमें आगे कहा गया है, ‘उनके भड़काऊ भाषणों, नेपाल आंदोलन, अरब स्प्रिंग आदि के संदर्भों और भ्रामक वीडियो के परिणामस्वरूप 24 सितंबर 2025 को लेह में हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए, जहां संस्थानों, इमारतों और वाहनों को जला दिया गया और इसके बाद पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया, जिसमें चार लोगों की दुर्भाग्यपूर्ण मौत हो गई. अगर वे अपनी व्यक्तिगत और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर उसी एजेंडे पर सरकार के साथ बातचीत फिर से शुरू होने पर भूख हड़ताल वापस ले लेते, तो इस पूरे घटनाक्रम से बचा जा सकता था। प्रशासन ने यह भी कहा कि वांगचुक को ‘सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में ‘प्रतिकूल तरीके से आगे काम करने’ से रोकने के लिए, उसने ‘विशिष्ट सूचनाओं के आधार पर’ ‘रासुका के तहत हिरासत में लेने और जोधपुर स्थानांतरित करने’ का फैसला किया गया है।
मालूम हो कि रासुका सरकार को किसी भी व्यक्ति को शुरुआती 12 महीने तक हिरासत में रखने की अनुमति देती है, बशर्ते कि वह अपने द्वारा गठित तीन-सदस्यीय सलाहकार बोर्ड की अनुमति प्राप्त कर ले. सलाहकार बोर्ड की मंजूरी के बाद, हिरासत की अवधि को 12 महीने से आगे भी बढ़ाया जा सकता है।उल्लेखनीय है कि यह नवीनतम आधिकारिक कार्रवाई केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा वांगचुक के एनजीओ स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (एसईसीएमओएल) का विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) लाइसेंस रद्द करने के एक दिन के भीतर हुई है.
राजनीतिक प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखे एक लंबे पोस्ट में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसद साकेत गोखले ने सोनम वांगचुक के एनजीओ के एफसीआरए रद्दीकरण न सिर्फ सवाल उठाया है बल्कि गृह मंत्रालय के फैसलों को मूर्खतापूर्ण बताया है. 25 सितंबर का आदेश शेयर करते हुए गोखले लिखते हैं:
गृह मंत्रालय ने लद्दाख के सोनम वांगचुक के एनजीओ का एफसीआरए लाइसेंस रद्द कर दिया. अब ज़रा आदेश के पेज 3 को देखिए और समझिए मोदी सरकार की मूर्खता.
वांगचुक के एनजीओ ने लिखा कि उन्हें ‘फूड सेक्योरिटी एंड सॉवरेनिटी’ पर जागरूकता के लिए दान मिला. ‘फूड सॉवरेनिटी’ का मतलब है- एक ऐसा खाद्य तंत्र जिसमें खाना उगाने, बांटने और खाने वाले लोग ही तय करते हैं कि खाना कैसे पैदा और वितरित होगा.
यानी, लोगों को यह अधिकार होना चाहिए कि उनका भोजन कैसे उगाया जाए. लेकिन गृह मंत्रालय के जोकरों ने क्या किया?
उन्होंने ‘फूड सेक्योरिटी एंड सॉवरेनिटी’ को बदलकर ‘स्टडी ऑन सॉवरेन्टी ऑफ इंडिया’ (भारत की संप्रभुता पर अध्ययन) बना दिया. इसका कोई मतलब ही नहीं निकलता. बिल्कुल भी नहीं.
यही है बदले की राजनीति का तरीका. एनजीओ ने ‘फूड सॉवरेनिटी’ लिखा था, लेकिन मोदी सरकार ने उसे ‘राष्ट्र की संप्रभुता’ बताकर उनका लाइसेंस रद्द कर दिया.
कोई भी स्कूली बच्चा समझ जाएगा कि ‘फूड सॉवरेनिटी’ को ‘सॉवरेन्टी ऑफ द नेशन’ पढ़ना कितना मूर्खतापूर्ण है.
यही वजह है कि अमित शाह के राज में राष्ट्रीय सुरक्षा मज़ाक बन चुकी है. मोदी सरकार की एजेंसियों को देश की सुरक्षा से मतलब नहीं. बल्कि, मोदी की एजेंसियां सबसे बेहूदी दलीलों का इस्तेमाल करके उन लोगों को फंसाने और निशाना बनाने में लगी रहती हैं, जो मोदी-शाह का विरोध करते हैं।उल्लेखनीय है कि ‘फूड सॉवरेनिटी’ शब्द का इस्तेमाल 1996 में बेल्जियम स्थित 81 देशों के 182 संगठनों के किसान समूह, वाया कैम्पेसिना द्वारा एक शब्द के रूप में किया गया था और बाद में इसे विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने अपनाया.
एफसीआरए लाइसेंस रद्द करने के कारण
बता दें कि मंत्रालय ने आरोप लगाया कि एसईसीएमओएल ने एफसीआर दिशानिर्देशों के कम से कम चार उल्लंघन किए हैं, जिसमें अधिनियम की धारा 17 का उल्लंघन करते हुए 2021-22 के दौरान अपने एफसीआर खाते में 3.5 लाख रुपये जमा करना भी शामिल है.
इसके जवाब में एसईसीएमओएल ने मंत्रालय को बताया है कि यह राशि एक पुरानी बस की बिक्री से प्राप्त हुई थी, जिसे एफसीआर जमा राशि से खरीदा गया था.
गृह मंत्रालय ने 18,200 रुपये के तीन दानों को भी चिह्नित किया, जिनमें से प्रत्येक ने एफसीआर अधिनियम की धारा 17 का उल्लंघन किया था.
एसईसीएमओएल ने जवाब दिया कि ये धनराशि स्वयंसेवकों से उनके भोजन और आवास के लिए प्राप्त हुई थी.
एसईसीएमओएल ने कहा, ‘हालांकि, यह राशि गलती से स्थानीय खाते के बजाय हमारे एफसीआर खाते में स्थानांतरित हो गई. हमारी वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि भारतीय स्वयंसेवकों को स्थानीय खाते में और विदेशी स्वयंसेवकों को एफसीआर खाते में योगदान स्थानांतरित करना चाहिए. इन निर्देशों के बावजूद, स्वयंसेवकों ने अनजाने में गलत खाते में राशि भेज दी.’
गृह मंत्रालय के आदेश में बताया गया है कि यह बयान एसईसीएमओएल द्वारा स्वीकारोक्ति है कि स्थानीय निधियां एफसीआर खाते में जमा की गईं, जो ‘अधिनियम की धारा 17 का उल्लंघन है’ जिसके तहत एफसीआर लाइसेंस प्राप्त लोगों को ‘सभी विदेशी अंशदान केवल एक निर्दिष्ट ‘एफसीआर खाते’ में ही प्राप्त करने होंगे.’
मंत्रालय ने यह भी आरोप लगाया कि भारतीय प्रबंधन संस्थान इंदौर की मेघा सांघवी द्वारा 19,600 रुपये जमा करने से एफसीआर की धारा 12(4) (a) (vi) का उल्लंघन हुआ है.
इस धारा के तहत, ‘पंजीकरण या पूर्व अनुमति के लिए आवेदन करने वाले’ व्यक्ति को विदेशी अंशदान का ‘व्यक्तिगत लाभ के लिए या उसे अवांछनीय उद्देश्यों के लिए उपयोग करने’ के लिए दंडित किया जा सकता है.
दिसंबर 2022 में राजीव गांधी फाउंडेशन का एफसीआरए लाइसेंस रद्द करने के लिए कानून की इस धारा का भी इस्तेमाल किया गया था। इसके जवाब में एसईसीएमओएल ने दावा किया कि लेह स्थित एनजीओ में स्वयंसेवा के लिए संघवी के भोजन और आवास के लिए 19,600 रुपये की जमा राशि प्राप्त हुई थी और उसे उन्हें वापस कर दिया गया था।गृह मंत्रालय ने कहा, ‘संस्था ने अधिनियम की धारा 12(4)(ए)(vi) के तहत पंजीकरण की शर्तों का उल्लंघन करते हुए स्वयं दानदाताओं को 19,600 रुपये वापस कर दिए हैं। एसईसीएमओएल के एफसीआरए लाइसेंस को रद्द करने का आदेश देते हुए मंत्रालय ने कहा है, ‘धारा 8(1)(ए), 17,18,19 के तहत ऊपर उल्लिखित उल्लंघनों और अधिनियम की धारा 12(4)(एफ)(आई) के तहत पंजीकरण की शर्तों के मद्देनजर, अधिनियम की धारा 14 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए एसोसिएशन का एफसीआरए पंजीकरण प्रमाणपत्र रद्द किया जा सकता है.’
सोनम की गिरफ्तारी तय थी: उमर अब्दुल्ला:
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि मुझे सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी पर कोई हैरानी नहीं हुई है. केंद्र सरकार और भाजपा जिस तरह से सोनम को निशाना बना रही थी, उससे तय था कि आज नहीं तो कल, उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा.
उन्होंने आगे कहा, ‘जम्मू-कश्मीर के लोगों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लिया, लेकिन उनसे किए गए वादे पूरे नहीं हुए. मुझे नहीं पता कि केंद्र सरकार किस दबाव में है।









Hits Today : 129
Who's Online : 11