– एक ऐसा नेता जो लोकतांत्रिक नेतृत्व के आदर्श पुरुष साबित हुआ
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: हर साल 25 दिसंबर को भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती मनाई जाती है. भारत के 10वें और तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्म 25 दिसंबर 1924 में हुआ था।वह बिना किसी पूर्वाग्रह के पक्ष हो या विपक्ष, वाम हो या दक्षिण, केद्र हो या परिधि सब प्रकार के लोगों के साथ संवाद करने के लिए प्रस्तुत रहते थे। लोकाभिमुख होने की यह वृत्ति प्रचारक के रूप में उनकी लम्बी देश-साधना के दौरान विकसित हुई थी। साथ ही संपादन कार्य उनको अद्यतन करता रहा। इस क्रम की ही परिणति थी कि भारतीय संस्कृति की साधना के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया।
आधुनिक मन वाले वाजपेयी जी ने आगे बढ़ कर देश की व्यापक कल्पना को संकल्प, प्रतिज्ञा और कर्म से जोड़ा और समर्पण के लिए आवाहन किया।
स्मरणीय है कि भारत पर अंग्रेजी औपनिवेशिक राज की लम्बी दासता से मुक्ति मिलने के बाद आज लोकतांत्रिक देशों की प्रथम पंक्ति में वैश्विक क्षितिज पर भारत आर्थिक और तकनीकी दृष्टि से एक सशक्त देश के रूप में प्रतिष्ठित हो रहा है। इस विरल उपलब्धि के पीछे राष्ट्रीय नेतृत्व और रीति-नीति की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने वह साहसिक कदम उठाया, जिसकी कल्पना तो वर्षों से थी, लेकिन निर्णय लेने का साहस कम ही दिखाया गया था।
बिना किसी विदेशी सहयोग के, अंतरराष्ट्रीय दबावों और खासकर अमेरिका की कड़ी निगरानी के बावजूद, भारत ने परमाणु परीक्षण सफलतापूर्वक अंजाम दिया। यह आसान नहीं था। ‘न्यूक्लियर हब’ माने जाने वाले देश हमेशा उन राष्ट्रों पर पैनी नजर रखते थे, जिनके पास परमाणु हथियार नहीं थे। भारत भी उन्हीं देशों की सूची में था, जिन्हें इस शक्ति से दूर रखने की कोशिशें लगातार होती रहीं। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी का फैसला सिर्फ उस समय की जरूरत नहीं था, बल्कि भविष्य की रणनीति भी था।
25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी एक ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने भारतीय राजनीति के समुद्र में घुल-मिलकर भी एक अलग पहचान बनाई। अटल बिहारी वाजपेयी ने यह प्रतिष्ठा कठिन राजनीतिक तपस्या और साधना से कमाई थी।
अटल बिहारी वाजपेयी के शब्द जितने कटु और कीमती थे, उससे कहीं ज्यादा कठिन उनके निर्णय हुआ करते थे। 1998 का परमाणु परीक्षण भी ऐसा ही एक कठिन निर्णय था, जिसने तत्काल आलोचना और दबाव झेले, लेकिन भविष्य में भारत को अधिक सुरक्षित, सशक्त और आत्मविश्वासी राष्ट्र बनाया। यह सिर्फ एक विस्फोट नहीं था, बल्कि भारत के आत्मसम्मान और सामरिक संप्रभुता की घोषणा थी।
एक बार परीक्षण करने के लिए गड्ढा खोदा जा चुका था। सुरंग तैयार हो चुकी थी। यहां तक कि परीक्षण की तिथि तय कर दी गई। लेकिन ऐन वक्त पर परीक्षण रद्द कर दिया गया, क्योंकि विदेशी दबाव था। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी एक मजबूत भारत का सपना संजो रहे थे, जिन्होंने अवसर मिलने पर इसे अपने निर्णयों से रूप दिया।
13 दिनों तक प्रधानमंत्री रहने के दौरान, उन्हें एहसास हुआ कि इतने जरूरी टेस्ट को अच्छे से करने के लिए ज्यादा समय नहीं है। जब वे 18 मार्च 1998 को सत्ता में वापस आए, तो उन्होंने वैज्ञानिकों को इसके लिए हरी झंडी दे दी।
1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार 13 पार्टियों की मिली-जुली सरकार थी। शपथ ग्रहण के कुछ दिनों बाद पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से एक मुलाकात की और कहा था, “सामग्री तैयार है, आप आगे बढ़ सकते हैं।” संसद में अपनी ताकत दिखाने के लगभग पखवाड़े के बाद ही अटल बिहारी वाजपेयी ने डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम और डॉक्टर चिदंबरम को बुलाकर परमाणु परीक्षण की तैयारी करने के निर्देश दे दिए थे।
एपीजे अब्दुल कलाम ही थे, जिन्होंने सलाह दी थी कि परीक्षण बुद्ध पूर्णिमा के दिन किया जाए, जो 11 मई 1998 को पड़ रही थी।
एपीजे अब्दुल कलाम ने एक इंटरव्यू में बताया, “बहुत प्रेशर था। लेकिन उन्होंने (अटल बिहारी वाजपेयी) फैसला लिया कि भारत डीआरडीओ टीम और उससे भी जरूरी एटॉमिक एनर्जी टीम के साथ टेस्ट करेगा। ये दो टीमें थीं। मैं और डॉ. चिदंबरम थे। हम उनसे मिले, उन्होंने कहा कि न्यूक्लियर टेस्ट के लिए आगे बढ़ो। भारत को परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र बनाने में अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका निर्णायक थी।”
उस समय प्रधानमंत्री के प्रिंसिपल सेक्रेटरी राजेश मिश्रा को वैज्ञानिकों के साथ कोऑर्डिनेशन का काम दिया गया था। अटल बिहारी वाजपेयी से हरी झंडी मिलने के बाद काम बहुत सावधानी से शुरू हुआ। कंस्ट्रक्शन का काम आम तौर पर रात में होता था, ताकि अमेरिकी सैटेलाइट्स की नजर से बचा जा सके।इस प्रोजेक्ट को ऑपरेशन शक्ति कोड नेम दिया गया था। ऑपरेशन में काम करने वाले साइंटिस्ट्स कभी एक साथ ट्रैवल नहीं करते थे। वे मिलिट्री के कपड़े पहनते थे और उनके कोड नेम होते थे।एपीजे अब्दुल कलाम का कोड नेम ‘मेजर जनरल पृथ्वीराज’ था, जबकि हमारे चिदंबरम का कोड नेम ‘नटराज’ था। भारतीय सेना की 58वीं इंजीनियर्स रेजिमेंट ने ग्राउंड वर्क पूरा करने में अपना पूरा सपोर्ट दिया था। आखिरकार, हिसाब-किताब का समय आ गया।दोपहर 3.45 बजे, पहला बम फोड़ दिया गया। इस परीक्षण ने भारत को वह परमाणु प्रतिरोध (न्यूक्लियर डिटरेंस) दिया, जिसकी उसे लंबे समय से जरूरत थी। दुनिया को यह स्पष्ट संदेश मिला कि भारत अब अपनी सुरक्षा को लेकर किसी पर निर्भर नहीं है और किसी भी आक्रामकता का माकूल जवाब देने में सक्षम है।
[25/12, 14:04] Slg Ashok Jha: आज कड़ी सुरक्षा के बीच खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान लौटे बांग्लादेश
– शेख हसीना की पार्टी को चुनाव में नो इंट्री,छात्र युवा मोहम्मद यूनुस के खिलाफ
– लगातार बदल रहे बांग्लादेश के हालात, कभी भी कुछ भी संभव
बांग्लादेश बोर्डर से अशोक झा: बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने साफ कर दिया है शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को फरवरी में होने वाले चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं दी जाएगी। ढाका में मीडिया को संबोधित करते हुए मुख्य सलाहकार के प्रेस सचिव शफीकुल आलम ने इसकी जानकारी दी है।बांग्लादेश में हालात बेकाबू होते जा रहे हैं। ढाका में एक शक्तिशाली विस्फोट के बाद बांग्लादेश में फिर से हिंसा भड़क उठी।इस हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई। विस्फोट के बाद भड़की भीड़ ने देर रात को ढाका यूनिवर्सिटी में तोड़फोड़ की, जिससे दहशत फैल गई।हमलावर काजी नजरुल इस्लाम की कविताएं और धार्मिक नारे लगाते हुए टेबल-कुर्सियां तोड़ते रहे।ग्लादेश छात्र लीग (बांग्लादेश छत्र लीग) के महासचिव शेख एनान ने छात्र नेता उस्मान हादी की हत्या में आवामी लीग की संलिप्तता के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने इसे मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली अंतरिम सरकार का ही एक षड्यंत्र करार दिया है।हिंसा के बीच बांग्लादेश की राजनीति जबरदस्त ड्रामा देखने को मिल रहा है। आज कट्टरपंथी समर्थकों के आगे घुटने टेकने वाले अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस को डबल झटका लगा है। पहले झटका पूर्व पीएम खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान ने दिया है। तारिक रहमान 17 साल बाद बांग्लादेश लौट आए हैं। बांग्लादेश लौटने पर उन्हें जबरदस्त समर्थन मिल रहा है। उनके स्वागत में लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। वहीं दूसरा झटका यूनुस के विशेष सहायक ने दिया है। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाले गृह मंत्रालय के विशेष सहायक खुदाबख्श चौधरी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने उनका इस्तीफा स्वीकार भी कर लिया है।
बुलेटप्रूफ गाड़ी और SWAT टीमों का पहरा:
तारिक रहमान की सुरक्षा को लेकर बांग्लादेश का प्रशासन कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता। सुबह 9:58 बजे विमान ढाका पहुंचा, लेकिन उनके स्वागत और सुरक्षा के लिए सुबह 7 बजे से ही बुलेटप्रूफ गाड़ियां एयरपोर्ट पर तैनात कर दी गई थीं। नागरिक उड्डयन प्राधिकरण (CAAB) ने सुरक्षा कारणों से शाम 6 बजे तक आम लोगों के एयरपोर्ट प्रवेश पर पाबंदी लगा दी है। पूरी राजधानी में जगह-जगह SWAT की टीमें मुस्तैद हैं। 17 साल बाद लौट रहे अपने नेता की एक झलक पाने के लिए ‘जुलाई 36 एक्सप्रेसवे’ पर आधी रात से ही हजारों समर्थक ठंड की परवाह किए बिना डटे रहे। समर्थकों का जुनून ऐसा था कि देश के कोने-कोने से लोग बस, ट्रेन और नावों के जरिए ढाका पहुंचने लगे, जिससे पूरा एक्सप्रेसवे इंसानी समंदर में तब्दील हो गया।
कौन हैं तारिक रहमान और क्यों कांप रहे हैं विरोधी?
तारिक रहमान बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बड़े बेटे हैं। उनके पिता ज़ियाउर रहमान बांग्लादेश के राष्ट्रपति रहे थे और उन्होंने ही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की स्थापना की थी। बीएनपी के प्रवक्ता रुहुल कबीर रिज़वी ने रहमान की वापसी को एक ‘निर्णायक राजनीतिक क्षण’ करार दिया है। तारिक के साथ उनकी पत्नी डॉ. जुबैदा रहमान और बेटी बैरेस्टर जाइमा रहमान भी लंदन से लौटी हैं। फरवरी में होने वाले आम चुनाव में तारिक रहमान का चेहरा अब पूरी तरह से केंद्र में आ गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी वापसी से बीएनपी कार्यकर्ताओं में जो ऊर्जा पैदा हुई है, वह सत्ता के मौजूदा समीकरणों को पूरी तरह पलट सकती है।
एयरपोर्ट से अस्पताल तक का भावनात्मक सफर
हवाई अड्डे पर औपचारिकताएं पूरी करने के बाद तारिक रहमान सीधे उस स्वागत स्थल पर जाएंगे जहां वे एक विशाल जनसभा को संबोधित करेंगे। लेकिन इस पूरी यात्रा का सबसे भावुक पल तब होगा जब वे अपनी अस्वस्थ मां खालिदा जिया से मिलने एवरकेयर अस्पताल पहुंचेंगे। मां-बेटे की यह मुलाकात 17 साल के लंबे अंतराल के बाद होने जा रही है। इसके बाद वे अपने गुलशन स्थित आवास पर लौटेंगे। उनकी इस वापसी ने शेख हसीना के समर्थकों और अंतरिम सरकार के बीच एक नई बेचैनी पैदा कर दी है। क्या तारिक रहमान बांग्लादेश की सत्ता में फिर से जिया परिवार का परचम लहरा पाएंगे? हादी के भाई ने यूनुस को चेतावनी देते हुए कहा कि उनका हश्र भी शेख हसीना जैसा होगा और बांग्लादेश छोड़कर भागना पड़ेगा। जाने-माने छात्र नेता और इंकलाब मंच के संयोजक शरीफ उस्मान हादी को ढाका में एक मस्जिद से बाहर निकलते समय गोली मार दी गई थी और कुछ दिनों बाद सिंगापुर के एक अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई, जिससे बांग्लादेश में तनाव बढ़ गया है। बांग्लादेशी मीडिया आउटलेट ‘द डेली स्टार’ ने उमर हादी के हवाले से सरकार को संबोधित करते हुए कहा, “यह आप ही हैं जिन्होंने उस्मान हादी की हत्या करवाई, और अब आप इसे एक मुद्दा बनाकर चुनाव को नाकाम करने की कोशिश कर रहे हैं।”
शरीफ उमर हादी ने ढाका के शाहबाग में नेशनल म्यूजियम के सामने इंकलाब मंच द्वारा आयोजित ‘शहीदी शपथ’ कार्यक्रम में भाषण देते हुए आरोप लगाया कि सरकार के अंदर ही एक गुट ने आने वाले नेशनल चुनाव को पटरी से उतारने के लिए यह हत्या करवाई। 32 साल का हादी 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव में उम्मीदवार भी था।
नोबेल पुरस्कार विजेता यूनुस के नेतृत्व वाली बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को चेतावनी देते हुए, उमर हादी ने कहा कि अगर उनके भाई के हत्यारों पर जल्दी मुकदमा नहीं चलाया गया, तो उनका भी शेख हसीना जैसा हश्र होगा। उमर ने कहा, “हत्यारों पर जल्दी मुकदमा चलाएं ताकि चुनाव का माहौल खराब न हो। सरकार हमारे सामने कोई ठोस प्रगति पेश करने में नाकाम रही है। अगर उस्मान हादी को न्याय नहीं मिला, तो एक दिन आपको भी बांग्लादेश से भागने पर मजबूर होना पड़ेगा।”
हादी की मौत के बाद बांग्लादेश में हिंसा
बता दें कि पिछले साल जब शेख हसीना की सरकार के खिलाफ बांग्लादेश में बड़ा आंदोलन हुआ था, तब उस्मान हादी नेतृत्व कर रहा था। वह भारत विरोधी बयानों के लिए जाना जाता था और पिछले दिनों उसकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। उस्मान हादी के भाई ने आगे दावा किया कि हादी को इसलिए मारा गया क्योंकि उन्होंने किसी भी एजेंसी या विदेशी आकाओं के सामने घुटने नहीं टेके। हादी की मौत से बांग्लादेश में भारी गुस्सा भड़क गया, 18 दिसंबर को उसकी मौत की खबर फैलते ही सैकड़ों लोग सड़कों पर उतर आए और हिंसा करने लगे, इमारतों में तोड़फोड़ की और मीडिया आउटलेट्स के दफ्तरों में आग लगा दी।









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