नोएडा के प्राइवेट स्कूलों का अद्भुत गणित: वही दीवारें, वही बेंच, बस हर साल नया ‘डोनेशन’ और ‘कमीशन’ का खेल!
उत्तर प्रदेश के शो-विंडो कहे जाने वाले नोएडा में इन दिनों एक अजीब सा ‘चमत्कार’ घटित हो रहा है। स्कूल वही है, ईंटें वही हैं, मास्टर साहब का चश्मा भी पुराना है, लेकिन हर अप्रैल आते ही अभिभावक की जेब पर चलने वाली कैंची बिल्कुल नई और धारदार हो जाती है। समाजसेवी विनोद शर्मा जी ने एक ऐसा सवाल दाग दिया है जिसने स्कूलों के ‘एजुकेशन बिजनेस’ की दुखती रग पर हाथ रख दिया है।
1. वही पुराना स्कूल, वही पुरानी क्लास, फिर ‘एडमिशन’ कैसा?
क्या आपने कभी सुना है कि अपने ही घर के कमरे में दोबारा घुसने के लिए आपको हर साल ‘प्रवेश शुल्क’ देना पड़े? नोएडा के स्कूलों में यही हो रहा है। बच्चा पिछले साल भी उसी कैंपस में था, इस साल भी वहीं है। न स्कूल ने रातों-रात अपनी लोकेशन मंगल ग्रह पर बदली है, न क्लासरूम में सोने की दीवारें जड़ी गई हैं। लेकिन ‘री-एडमिशन’ (जिसे अब चतुरता से ‘एनुअल चार्ज’ कहा जाता है) के नाम पर हजारों रुपये ऐसे वसूले जाते हैं, मानो बच्चा पहली बार स्कूल की दहलीज लांघ रहा हो।
2. सिलेबस का ‘मायाजाल’: वही अकबर, वही बीरबल, पर बुक नई चाहिए!
विनोद शर्मा जी का यह तर्क बड़ा ही वाजिब है कि जब कक्षा वही है, विषय वही हैं, तो किताबें हर साल बदल क्यों जाती हैं? इतिहास में अकबर के कारनामे नहीं बदले, विज्ञान में पानी का फॉर्मूला आज भी H_2O ही है, लेकिन प्रकाशक का नाम और ‘कमीशन’ का प्रतिशत बदल जाता है।
पिछली कक्षा के बच्चों की किताबें बेकार कर दी जाती हैं ताकि अभिभावक को ‘नई’ सुगंध वाली महंगी किताबें स्कूल के निर्धारित वेंडर से ही खरीदनी पड़ें। यह शिक्षा का प्रसार नहीं, बल्कि कागज़ और जिल्द का शुद्ध व्यापार है।
3. ‘समाजसेवी’ की पुकार और प्रशासन की चुप्पी
विनोद शर्मा जी का कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन को इस पर ‘ठोस कलम’ उठाने की जरूरत है। पर लगता है प्रशासन की कलम की स्याही अक्सर अप्रैल के महीने में सूख जाती है। जब तक प्रशासन इन प्राइवेट स्कूलों की ‘बैलेंस शीट’ और ‘बुक-कमीशन’ के नेक्सस पर नकेल नहीं कसेगा, तब तक मध्यमवर्गीय अभिभावक इसी तरह ‘किस्त’ और ‘फीस’ के बीच पिसता रहेगा।
नोएडा के स्कूलों में शिक्षा अब ‘संस्कार’ नहीं, बल्कि एक ‘सब्सक्रिप्शन’ बन गई है। अगर हर साल वही बेंच और वही टीचर है, तो फीस में यह ‘सालाना इजाफा’ और नई किताबों का पाखंड सिर्फ और सिर्फ लूट का आधुनिक तरीका है। अब समय है कि ‘सख्त आदेश’ फाइलों से निकलकर स्कूल के गेट तक पहुँचे।
विनोद शर्मा









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