गुप्त नवरात्रि के पांचवे दिन माता छिन्नमस्ता की होती है पूजा

सिलीगुड़ी: माघ मास में आने वाले गुप्त नवरात्रि के पांचवे दिन माता छिन्नमस्ता की पूजा अर्चना की जाती है। देवी छिन्नमस्ता को माता चिंतपूर्णी का स्वरूप माना गया है। शिवपुराण और मार्कण्डेय पुराण में इस बात का जिक्र मिलता है कि देवी छिन्नमस्ता राक्षसों का संहार कर देवताओं को उनसे मुक्त कराया था। यह भी माना जाता है कि देवी छिन्नमस्ता की पूजा करने से मनुष्य को समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है और साथ ही सुख और समृद्धि का वरदान मिलता है पूर्वी भारत जैसे पश्चिम बंगाल, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल में इनकी विशेष रूप से पूजा की जाती है. ऐसा माना जाता है कि माता छिन्नमस्ता की पूजा में यदि कोई कमी की जाती है तो वह विपरीत फल भी दे देती हैं। माता छिन्नमस्ता का स्वरुप : छिन्नमस्ता दस महाविद्यायों में से एक मानी जाती हैं, माता छिन्नमस्तिका को ही ‘प्रचण्ड चण्डिका भी कहा जाता है. हिन्दू धर्म के सभी देवी देवताओं में सबसे अलग देवी छिन्नमस्ता का स्वरूप हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार छिन्नमस्ता देवी तीनों गुणों; सात्विक, राजसिक तथा तामसिक, का प्रतिनिधित्व करती हैं।माता छिन्नमस्ता की कथा:माता छिन्नमस्ता की उत्पत्ति से जुड़ी एक पौराणिक कथा प्रसिद्ध है. कथा के अनुसार एक दिन माता छिन्नमस्ता अपनी दो सखियों के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान कर रही थीं। तभी माता की सखियों ने कहा कि हमें बहुत ज्यादा भूख लगी है और माता से कुछ खाने को मांगने लगी तो माता ने उन्हें कुछ देर प्रतीक्षा करने को कहा लेकिन भूख से व्याकुल सखियां बार-बार माता से कुछ खाने के लिए मांगती रही. माता से अपनी सखियों की भूख देखी नहीं गई और मा भवानी ने अपना सिर काट दिया. उनके सिर से खून की तीन धाराएं निकलीं। इनमें से दो धाराओं को उनकी दोनों सखियों ने अपनी प्यास बुझाई और तीसरी धारा से स्वयं माता की प्यास बुझी। माना जाता है कि तब से वह माता छिन्नमस्ता के नाम से संसार में जानी जाती है। देवी दुष्टों के लिए संहार करने और भक्तों के लिए दया भाव रखती हैं, इसलिए देवी की आराधना हमेशा सच्चे और निर्मल मन से करनी चाहिए। मां छिन्नमस्ता की पूजा विधि:माता छिन्नमस्ता की पूजा करने के नियम कुछ इस प्रकार है। स्नान करने के बाद पूजा घर में दक्षिण- पश्चिम दिशा की ओर मुख करके नीले रंग के आसन पर बैठे। लकड़ी की चौकी पर नीले रंग का कपड़ा बिछाकर उस पर छिन्नमस्ता यंत्र रखें और हाथ में जल लेकर संकल्प करने के बाद हाथ जोड़कर माता छिन्नमस्ता का ध्यान करें। माता छिन्नमस्ता को सरसों के तेल में नील मिलाकर दीपक जलाएं। माता पर नील अथवा सफेद फूल चढ़ाएं और लोबान से धूप करें।
उड़द दाल से बनी मिठाई का भोग लगाएं।
माता छिन्नमस्तिका मंत्र: बाएं हाथ में काले नमक की डली लेकर दाएं हाथ से काले हकीक अथवा अष्टमुखी रुद्राक्ष माला अथवा लाजवर्त की माला से देवी के इस अद्भुत मंत्र का जाप करें।श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीये हूं हूं फट् स्वाहा।रिपोर्ट अशोक झा

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