– भागवत ने बताया भारत की संस्कृति हिन्दू मूलक होने की वजह से ही समावेशी व सहिष्णुता से परिपूर्ण
– संघ प्रमुख की नजर में भारत में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिन्दू
– संघ प्रमुख के वक्तव्य को नहीं देखा जाना चाहिए संकीर्णता के चश्मे से
अशोक झा/ लखनऊ: उत्तरप्रदेश के हरदोई में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन पर पथराव कर दिया गया। सुरक्षा एजेंसियों और रेलवे के लिए चिंता की बात यह भी थी कि उसी ट्रेन में मोहन भागवत यात्रा कर रहे थे।ट्रेन के हरदोई से गुजरते समय अज्ञात लोगों ने पथराव कर दिया था, जिससे एक कोच का शीशा टूट गया. घटना के बाद ट्रेन में हलचल मच गई और सुरक्षा एजेंसियां तुरंत सक्रिय हो गईं.
सूत्रों के अनुसार, एहतियातन मोहन भागवत को दूसरे कोच में शिफ्ट कर दिया गया. हालांकि आधिकारिक स्तर पर इसे लेकर कोई बयान जारी नहीं किया गया है. सूत्रों के अनुसार, इस घटना में मोहन भागवत को किसी प्रकार की चोट नहीं आई है और वे पूरी तरह सुरक्षित हैं. ट्रेन को निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत आगे बढ़ाया गया। घटना की जानकारी मिलते ही रेलवे सुरक्षा बल (RPF) और स्थानीय पुलिस ने जांच शुरू कर दी है. आसपास के इलाकों में संदिग्धों की तलाश की जा रही है. रेलवे अधिकारियों का कहना है कि पथराव करने वालों की पहचान कर सख्त कार्रवाई की जाएगी। दरअसल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत दो दिवसीय प्रवास पर शुक्रवार को मेरठ जा रहे थे। वह दिल्ली से वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन के जरिए सिटी रेलवे स्टेशन पहुंचे, जहां संघ कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों ने उनका स्वागत किया। स्टेशन परिसर में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के लखनऊ में दिये गये बयान को सम्पूर्ण राष्ट्रीय सन्दर्भों में देखने की जरूरत इसलिए है कि भारत की संस्कृति हिन्दू मूलक होने की वजह से ही समावेशी व सहिष्णुता से परिपूर्ण रही है। आठवीं सदी में भारत में इस्लाम धर्म के आने से पहले इसकी संस्कृति के मूल मानक सर्वग्राही व सम्पूर्ण सृष्टि के प्राणीमात्र में प्रेम व सौहार्द भरने वाले थे जिसकी वजह से इस्लाम के आने के बावजूद इनमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ और भारत बीसवीं सदी में भी वसुधैव कुटुम्बकम् का उद्घोष करता रहा।
यह आश्चर्य नहीं था कि 1947 में धर्म के आधार पर भारत के दो टुकड़े हो जाने के बावजूद देश के तत्कालीन कर्णधारों ने आजाद भारत को धर्म या पंथ निरपेक्ष राष्ट्र घोषित करने का साहस दिखाया। इसका असली कारण यह था कि भारत के बहुसंख्य लोग हिन्दू थे और जो मानते थे कि इस देश की संस्कृति में वह तासीर है जिसके असर से गैर हिन्दू भी नहीं बच सकते। वास्तविकता भी यही है कि भारत में माने जाने वाले सभी धर्मों के अनुयाइयों पर हिन्दू संस्कृति का प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सका जिनमें इस्लाम धर्म भी अपवाद नहीं था। भारत चुंकि तीज-त्यौहारों व उत्सवों वाला देश था अतः प्रत्येक धर्म के अनुयाइयों पर इसका गहरे तक असर पड़ा। यही वजह है कि पंजाब व बंगाल के मुसलमानों पर इन दोनों क्षेत्रीय संस्कृतियों की गहरी छाप हमें आज भी दिखाई पड़ती है। असल में श्री भागवत का यह कहना कि भारत में रहने वाला प्रत्येक हिन्दू है, अतिरंजित नहीं है क्योंकि विदेशी आक्रमणकारियों ने ही भारत के निवासियों को यह नाम दिया था। उनकी नजर में भारत में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिन्दू था। इसकी छाप हम आज भी तब देखते हैं जब भारतीय मुसलमान हज करने के लिए सऊदी अरब जाते हैं। इन भारतीय मुसलमानों को वहां ‘हिन्दी’ कहा जाता है।श्री भागवत ने इसके साथ ही हिन्दू समाज में व्याप्त जातिवाद पर भी चिन्ता व्यक्त की है और कहा है कि समाज में जो लोग इस आधार पर पीछे रह गये हैं उन्हें झुक कर ऊपर उठाना होगा। इसमें स्पष्ट सन्देश है कि हिन्दू समाज को अगली सदियों में मानववादी दृष्टि अपनाते हुए सामाजिक गैर बराबरी को दूर करना होगा और इसके लिए अपने ही बीच से सुधार शुरू करने होंगे। अक्सर संघ पर यह आरोप लगा दिया जाता है कि वह मनुस्मृति का हिमायती है। इसमें देखने वाली बात केवल इतनी है कि हिन्दू समाज में जिन जातियों का निर्माण हुआ है उनमें लोगों के व्यवसाय या पेशे की भी प्रमुख भूमिका रही है मगर अब 21वीं सदी चल रही है और शिक्षा से लेकर विभिन्न ज्ञान के क्षेत्र समाज के हर वर्ग के व्यक्ति के लिए खुल रहे हैं अतः व्यवसाय मूलक जातियों का भी खात्मा होना निश्चित है। यह भी हिन्दू समाज की विशेषता रही है कि चारों वर्णों में से किसी एक में जन्म लेना वाला व्यक्ति कर्म के आधार पर अपनी जाति बदलता रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ऋषि विश्वमित्र रहे हैं जो जन्म से क्षत्रिय या राजा थे मगर कर्म से ऋषि हो गये लेकिन इसके समानान्तर यह भी वास्तविकता है कि इसी भारत में जन्मगत जाति के आधार पर सदियों तक दलित या कथित शूद्र वर्ग के लोगों के साथ पशुवत व्यवहार होता रहा है अतः 21 वीं सदी में इसका जड़मूल से सफाया बहुत जरूरी है क्योंकि यह विज्ञान से भी बढ़ कर अब क्रत्रिम बुद्धिमत्ता का युग होता जा रहा है। भारत वासियों की दृष्टि शुरू से ही वैज्ञानिक रही है जिसके प्रमाण भी हमें इसकी संस्कृति में समाहित मिलते हैं। प्रकृति को देवतुल्य मान कर इसकी पूजा करने का विधान केवल हिन्दू संस्कृति में ही है जो यह बताता है कि हमारे पुरखे पर्यावरण के प्रति कितने संवेदनशील थे परन्तु 1947 में जब देश का बंटवारा भारत व पाकिस्तान में हुआ तो यह लकीर खिंच गई कि हिन्दू व मुसलमान दो राष्ट्र हैं। मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने भाषा से लेकर सांस्कृतिक चेतना व एेतिहासिक मान्यताओं के दम पर अंग्रेजों के सामने यह साबित किया कि हिन्दू व मुस्लिम दो अलग- अलग कौमें हैं। हालांकि उस समय भी भारत में एेसे मुसलमानों की कमी नहीं थी जो हिन्दू व मुसलमानों की मुत्तैहदा कौमियत के हिमायती थे और भारत का बंटवारा नहीं चाहते थे। संघ प्रमुख ने इसी बात को आज थोड़ा घुमा कर कहा है और विचार व्यक्त किया है कि भारत में हर रहने वाला हिन्दू ही है, बेशक उसकी पूजा पद्धति अलग हो सकती है क्योंकि ये सभी एक ही पूर्वजों की सन्तान हैं। इसका प्रमाण यह है कि भारत में मुस्लिम आक्रमणों के बाद भारी संख्या में धर्म परिवर्तन हुआ और यहीं के निवासियों को इस्लाम धर्म की रवायतों में ढाला गया। वर्ना मुस्लिम आक्रान्ताओं के साथ अरब या अन्य देशों से बहुत थोड़ी संख्या में ही लोग आये थे। इस बात पर जरूर मतभेद हो सकते हैं कि सबसे ज्यादा धर्मान्तरण किस मुस्लिम सुल्तान या बादशाह के कार्यकाल में हुआ मगर धर्म परिवर्तन से इंकार नहीं किया जा सकता। यह विचारणीय है कि हमने स्वतन्त्र भारत में प्रत्येक धर्मानुयायी को अपने-अपने धर्म का प्रचार व प्रसार करने का खुला संवैधानिक अधिकार दिया जिसका गलत लाभ कुछ कट्टरपंथियों ने उठाया और लालच या अन्य प्रलोभनों के जरिये लोगों का धर्म परिवर्तन कराते रहे जिसकी वजह से ऐसे धर्मों के मानने वालों की जनसंख्या में वृद्धि इस वजह से भी हुई जबकि हिन्दू मतावलम्बी ऐसे रास्तों से अलग रहे। जब भारत का अस्तित्व ही हिन्दू संस्कृति व इसकी मान्यताओं पर टिका हुआ है तो इस धर्म के मानने वालों का भी यह दायित्व बनता है कि वह भारत की राष्ट्रीयता को सर्वदा जीवन्त रखें। क्योंकि हिन्दू राष्ट्रीयता व भारतीयता में कोई खास अन्तर नहीं है। अतः संघ के प्रमुख के वक्तव्य को संकीर्णता के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।








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